धनबाद, 13 अगस्त: आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने अंडरग्राउंड माइंस में बैकफिलिंग के लिए प्राकृतिक रेत के एक संभावित पर्यावरण-अनुकूल विकल्प तैयार किया है। शोध में फ्लाई ऐश और प्लास्टिक वेस्ट का इस्तेमाल कर फ्लाई ऐश-प्लास्टिक एग्रीगेट्स (FPA) विकसित किया गया है।
यह शोध माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख प्रो. भंवर सिंह चौधरी के नेतृत्व में किया गया। इसमें पोलैंड के विशेषज्ञों ने भी सहयोग किया। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक से एक ओर प्राकृतिक रेत की आवश्यकता कम करने में मदद मिल सकती है, वहीं फ्लाई ऐश और प्लास्टिक कचरे के उपयोग का रास्ता भी खुल सकता है।
फ्लाई ऐश और प्लास्टिक वेस्ट से तैयार किया FPA
अंडरग्राउंड माइनिंग के बाद खाली हुए स्थानों को भरने के लिए बैकफिलिंग में बड़ी मात्रा में प्राकृतिक रेत का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी ओर, कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश और प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए चुनौती बना हुआ है।
शोधकर्ताओं ने दोनों समस्याओं को जोड़ते हुए 80 प्रतिशत फ्लाई ऐश और 20 प्रतिशत हाई-डेंसिटी पॉलीएथिलीन (HDPE) प्लास्टिक वेस्ट को थर्मल प्रोसेस के माध्यम से मिलाकर FPA तैयार किया।
यह रिसर्च मिनिस्ट्री ऑफ कोल से फंडेड प्रोजेक्ट के तहत प्रो. भंवर सिंह चौधरी और उनके रिसर्च स्कॉलर डॉ. मुनिपाला मनोहर ने की है।
लैब टेस्ट में सामने आए कई उपयोगी गुण
शोध टीम के मुताबिक, प्रयोगशाला परीक्षण में FPA में कई ऐसे गुण सामने आए, जो इसे अंडरग्राउंड माइंस में बैकफिलिंग के लिए उपयोगी बना सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सामग्री मजबूत और टिकाऊ होने के साथ बेहतर जल निकासी में भी मदद कर सकती है।
प्राकृतिक रेत की तुलना में इसका वजन कम होने के कारण शोधकर्ताओं का मानना है कि इसे स्लरी पाइपलाइन के माध्यम से भूमिगत खदानों तक पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
FPA के कणों की सतह खुरदरी और कोणीय पाई गई। शोध के अनुसार, इससे कणों के बीच बेहतर लॉकिंग हो सकती है और बैकफिलिंग के बाद भूमिगत क्षेत्र की स्थिरता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। परीक्षणों के दौरान सामग्री ने दबाव के प्रति भी बेहतर प्रतिरोध प्रदर्शित किया।
हाइड्रोलिक स्टोइंग में इस्तेमाल की संभावना
शोधकर्ताओं के अनुसार, भविष्य में FPA का इस्तेमाल हाइड्रोलिक स्टोइंग में प्राकृतिक रेत और बिना संशोधित फ्लाई ऐश के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।
हाइड्रोलिक स्टोइंग प्रक्रिया में खनन के बाद भूमिगत खाली स्थानों को सामग्री को पंप करके भरा जाता है। इसका उद्देश्य भूमिगत संरचना की स्थिरता और खदान सुरक्षा को बेहतर बनाने में मदद करना है।
हालांकि, इसका व्यापक व्यावसायिक उपयोग आगे के परीक्षणों और व्यावहारिक स्तर पर मूल्यांकन पर निर्भर करेगा।
पोलैंड के विशेषज्ञों ने भी किया सहयोग
इस अंतरराष्ट्रीय शोध में पोलैंड के डॉ. क्रिज़िस्तोफ स्क्रिप्कोव्स्की, फैकल्टी ऑफ सिविल इंजीनियरिंग एंड रिसोर्स मैनेजमेंट, मिकिविचा; डॉ. क्रिज़िस्तोफ ज़ागोर्स्की, फैकल्टी ऑफ मैकेनिकल इंजीनियरिंग एंड रोबोटिक्स, एजीएच यूनिवर्सिटी ऑफ क्राकोव तथा डॉ. अन्ना ज़ागोर्स्का, इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजिकल साइंसेज, पोलिश एकेडमी ऑफ साइंसेज, क्राकोव ने सहयोग किया।
प्रो. भंवर सिंह चौधरी ने कहा कि शोध का उद्देश्य कचरे को बोझ मानने के बजाय उसे टिकाऊ खनन के लिए उपयोगी संसाधन में बदलना है। उनके अनुसार, यह तकनीक प्राकृतिक रेत की बढ़ती मांग को कम करने के साथ फ्लाई ऐश और प्लास्टिक वेस्ट के बेहतर उपयोग की संभावनाएं पैदा कर सकती है।
प्रो. भंवर सिंह चौधरी का शोध अनुभव
प्रो. भंवर सिंह चौधरी आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख हैं। उन्होंने 1998 में एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज, जोधपुर से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने माइन प्लानिंग में एमटेक और आईआईटी (बीएचयू), वाराणसी से रॉक ब्लास्टिंग में पीएचडी की।
उन्हें उद्योग क्षेत्र में छह वर्ष से अधिक का अनुभव है और उनके 100 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उनके प्रमुख शोध क्षेत्रों में माइन प्लानिंग, रॉक ब्लास्टिंग, टनलिंग और अंडरग्राउंड माइनिंग टेक्नोलॉजी शामिल हैं।


