सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दुर्घटनाओं में मुआवजे को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अगर किसी रेल हादसे में किसी यात्री की मौत हो जाती है, तो सिर्फ ट्रेन का टिकट न मिलने के आधार पर उसके परिवार को मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या मानवीय और उदार तरीके से की जानी चाहिए। अदालत के अनुसार, लाभ देने वाले कानूनों का उद्देश्य लोगों की मदद करना है, इसलिए उनका अर्थ केवल शब्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके उद्देश्य को ध्यान में रखकर फैसला किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने मुआवजा देने का दिया आदेश
शीर्ष अदालत ने ट्रेन से गिर कर मौत के मामले में आठ लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। सर्वोच्च अदालत ने रेलवे दावा ट्रिब्युनल और हाई कोर्ट का फैसला रद कर दिया है जिसमें टिकट न मिलने के कारण मृतक के वास्तविक यात्री साबित न होने के आधार पर मुआवजा दावा खारिज कर दिया गया था।
फैसले में शीर्ष अदालत ने रेलवे में सुधारों, यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भी अहम निर्देश दिये हैं। साथ ही कोर्ट ने रेलवे मैनुअल में सैकेंड क्लास पैसेंजर यानी दूसरे श्रेणी के यात्री शब्द पर आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा हालांकि ये यात्री द्वारा यात्रा पर किये गए खर्च से जुड़ा है लेकिन हमारा सुझाव है कि श्रेणी यानी क्लास का संबंध कोच से होना चाहिए न कि यात्री से। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे देश में श्रेणी-आधारित भेदभाव का इतिहास रहा है, और इस तरह का वर्गीकरण भारत के संविधान की भावना के खिलाफ और अपमानजनक है।
रेलवे यात्रियों और उनके परिवारों के अधिकारों को मजबूत करने वाला यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और जस्टिस एन कोटीश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया है। बता दें कि इस मामले में 2015 में एक व्यक्ति की ट्रेन से गिर कर मौत हो गई थी उसकी पत्नी लता ने रेलवे दावा ट्रिब्युनल में दावा दाखिल कर मुआवजा देने की मांग की थी लेकिन टिकट नहीं मिलने के आधार पर ट्रिब्युनल और फिर हाई कोर्ट उसका दावा खारिज कर दिया था जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
रेलवे दुर्घटना में टिकट न होने पर भी मिलेगा मुआवजा
पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस करोल ने कहा है कि रेलवे एक्ट एक कल्याणकारी कानून है और इसकी व्याख्या उदार और उद्देश्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए। पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि विधायिका के इरादों को आगे बढ़ाने के लिए लाभकारी कानूनों की व्याख्या शाब्दिक या प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण के बजाए उद्देश्यपूर्ण और उदार तरीके से की जानी चाहिए। इसका मूल उद्देश्य यह समझें कि इरादे को क्रियान्वित करना है।
कोर्ट ने कहा कि तकनीकी दृष्टिकोण और प्रक्रिया की खामियों से कानून के कल्याणकारी उद्देश्य को विफल नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि राज्य के एक अंग के रूप में रेलवे के लिए इस तरह का प्रतिबंधात्कम और संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाना ठीक नहीं है। कहा गया है कि रेलवे अधिनियम की धारा 124ए के तहत कार्यवाही दोष रहित दायित्व के सिद्दांत पर आधारित है। इसका उद्देश्य रेलवे दुर्घटनाओं के पीड़ितों को बिना किसी लापरवाही के प्रमाण की आवश्यकता के शीघ्र मुआवजा प्रदान करना है।
पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मृतक के पास ट्रेन का टिकट नहीं मिला , एक असली यात्री के तौर पर उसकी स्थिति नहीं बदलेगी। यह माना गया कि दावा करने वाले की शुरुआती जिम्मेदारी को एक हलफनामे के जरिए पूरा किया जा सकता है। इस मामले में पत्नी ने हलफनामा दिया था।
बता दें कि हो कि इस मामले में मृतक का सामान नहीं मिला था उसकी पत्नी का कहना था कि उसने टिकट ली थी जो सामान के साथ बैग में थी जो नहीं मिला। इस पर कोर्ट ने फैसले में लिखा है कि रेलवे मैनुअल के मुताबिक किसी यात्री की तीन जगह टिकट चेक की जाती है अगर मैनुअल का पालन किया गया होता तो उसके रेल पर चढ़ने से पहले टिकट चेक किया गया होता और उसका रिकार्ड होता। इससे यह मुख्य सवाल ही खत्म हो जाता कि मृतक बिना टिकट के यात्रा कर रहा था।
कोर्ट ने यात्रियों के प्रति रेलवे का दायित्व बताया है हालांकि साथ यह भी कहा है कि यात्रियों की भी जिम्मेदारी होती है। रेल में भीडभाड़ की समस्या को भी फैसले में इंगित किया गया है और इसके लिए कई सुरक्षा उपाय करने की बात कही गई है। कहा गया है कि इसके लिए ज्यादा कर्मचारियों की जरूरत होगी इसलिए कोर्ट का सुझाव है कि अगर रेलवे युवाओं को रोजगार दे तो यह संस्था और पूरे देश के लिए अच्छा होगा। इससे न सिर्फ उन्हें रोजीरोटी का पक्का जरिया मिलेगा बल्कि लोगों की जान भी बचाई जा सकेगी। फैसले में रेलवे के बारे में कई आंकड़े भी दिये गए हैं।
बता दें कि कोर्ट ने आठ लाख मुआवजे की रकम चार हफ्ते के अंदर देने का आदेश दिया है और ऐसा नहीं होने पर आठ प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा।

