राजयसभा चुनाव में निर्दलीय नाथवानी के उतरने से पसोपेश में महागठबंधन, क्या खेला हो जायेगा?

राजयसभा चुनाव में निर्दलीय नाथवानी के उतरने से पसोपेश में महागठबंधन, क्या खेला हो जायेगा?

रांची (Ranchi ): शिवपूजन सिंह /वरिष्ठ पत्रकार,झारखण्ड की सियासत में सभावनाओं का सफर कभी किसी सियासतदान के लिए खत्म नहीं होता. यहां सत्ता के लिए जलने -जलाने और अपनाने का खेल चलता रहा है. इसके सियासी अतीत के बियाबान में झांके तो तजुर्बा और यादें साफ -साफ दिमाग़ में घूमेगी कि यहां की राजनीति की कोई दहलीज नहीं,न कोई पैमाना और न कोई वजूद किसी का रहा. यहां निर्दलीय भी सत्ता का सिरमौर बन चुके है.उदाहरण के तौर पर निर्दलीय जीत हासिल करने वाले मधु कोड़ा भी मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच चुके है. ऐसे में कब यहां कोई सियासतदान सिकंदर बन जाए, ये कोई आकलन और अटकले नहीं लगा सकता. अपने उदय से ही यहां कि सियासत लड़खड़ाते रहीं है और यह सिलसिला आज तक जारी है.


अभी झारखण्ड की सियासी बिसात पर मजारा राजयसभा चुनाव का है, जिसकी सरगर्मियों की तपिश बर्दाश्त नहीं हो रहीं है.निर्दलीय उतरकर ताल ठोक रहें परिमल नाथवानी कांग्रेस के लिए कांटा बने हुए है. हालांकि, धुरंधर नाथवानी चुनावी चोसर में कमतर और कमजोर होंगे. यहां सोचना बेवकूफ़ी के साथ बेमानी होंगी.


सबसे दौलतमंद उम्मीदवार नाथवानी 2008 और 2014 में भी राजयसभा चुनाव निर्दलीय बड़े मजे से जीत गए थे. उनकी सियासी समझ, और राजनीतिक बिरादरी में सम्बन्ध काफ़ी तगड़ाी है. जोड़-तोड़, जुगाड़ और जुगत के सियासी बाजीगर नाथवानी रहें है. ऐसे में माहिर परिमल को पटखनी देना तो आसान नहीं है.
ऐसी उड़ती -उड़ती खबर फिजा में है कि नाथवनी 33 वोटों का जुगाड़ है. हालांकि, अटकले और आकलन ही किया जा रहा है, सच्चाई तो 18 जून कों ही मालूम पड़ेगी. आखिर नाथवानी वाकई बाजीगर है कि नहीं.


हालांकि समीकरण देखे तो भाजपा के 21, जदयू, आजसू और लोजपा के एक़ -एक़ मिलाकर 24 वोट उनके साथ है. वही जयराम महतो भी शायद उनकी तरफ हो जाए तो जीत के लिए 28 की संख्या में बचे बाकी तीन वोट की ही दरकार और जरुरत होंगी. ऐसे में लाजमी है कि सेंधमारी सत्तासीन महागठबंधन के विधायकों पर ही डोरे डाले जायेंगे. क्योंकि इसके बिना जीत की कल्पना करना ही बेमानी होगी.
ऐसे में नाथवानी के निशाने पर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और राजद के विधायक होंगे .
हालांकि, समय, समीकरण और साधन तो महागठबंधन के पक्ष में है. अगर कुछ गड़बड़ नहीं हुई, सबकुछ समतल रहा तो कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा आसानी से जीत सकते है क्योंकि 56 वोट महागठबंधन के पास है. जो दो सीट की जीत के लिए मुफिद है, लेकिन यहां तो भय भीतरघात की है. यहां तो अपने में ही कौन अपना है यही मालूम करना सबसे पेचीदा पहेली कांग्रेस के लिए हो गई है. अगर कांग्रेस इतनी आश्वास्त और मस्त रहती तो नाथवानी के नामांकन का विरोध और इतना तेज़ आंदोलन नहीं करती. न ही नाथवानी कों रोकने के लिए दिल्ली से लश्कर बुलाती.


कांग्रेस उतने नामचीन नाम नहीं रहें प्रणव झा को तो उतार दी है,लेकिन यहां जीत के लिए कश्मकश और इम्तिहान बहुत बड़ा है. अगर कांग्रेस जीत गई तो सबकुछ ठीक रहेगा. लेकिन अगर पराजित हो गए तो फिर बवंडर और बखेड़ा आना तय है. दरअसल ये सिर्फ कांग्रेस की हार नहीं होंगी बल्कि महागठबंधन की दोस्ती पर दरार पैदा करेंगी और सवाल फिर तेज़ और तेवर वाले उठेंगे. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से भी सवालों की जद में हो जायेगे , आखिर ये कैसे हो गया?और किसने दगा दिया?और कौन गेम किया?. सबसे बड़ा प्रश्न असहज करेगा कि भला ये कैसा गठबंधन है?. जहां साथ -साथ होकर भी पराये है.?
वैसे भी सत्तरुढ़ गठबंधन की सेहत पर सवाल खड़े होते रहें है. बाहर से कुछ और अंदर से कुछ की बात उठते रहीं है. वैसे भी कांग्रेस और जेएमएम में दोस्ती की दरार की खबरें सुर्खिया बनकर फ़जीहत कराते रहीं है.हालांकि,सच ये भी है कि सबकुछ बेहतर और बढ़िया तालमेल सरकार में शामिल साथियों के बीच है. ऐसा कहना सौ फीसदी तो सही और मुनासिब नहीं ही होगा.

अब राजयसभा चुनाव की परीक्षा में साफ होगा कि वाकई महागठबंधन झारखण्ड में एक़ है और इनकी दोस्ती अटल और अविचल है. खैर आगे क्या होगा ये तो चुनाव के बाद मालूम पड़ेगा. लेकिन राजयसभा के इस चुनाव में भाजपा तो मस्त है, क्योंकि वो बाहर से इस सियासी खींचतान की मजे ले रहीं है. क्योंकि तक़रीबन उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बल्कि पाने के लिए ही बहुत कुछ है.वही झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के लिए भी उतनी झंझट नहीं है क्योंकि उनके उम्मीदवार बैधनाथ राम की जीत तो लगभग तय ही है. सबसे बड़ी दुविधा के भंवर में कांग्रेस फंसी हुई है, क्योंकि इस चुनाव में असल अग्निपरीक्षा उसे ही देना है. जहां उसे उस अग्निपथ पर चलकर मंजिल हासिल करना है, जहां जलने का खतरा परायों के साथ-साथ अपनों से भी है. अब देखना है कि कांग्रेस इसे कैसे सभालती और उबरती है.

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