पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सत्ता में आने पर बसें भगवा रंग की हो गई हैं। रंग बदलने की यह बात पिछले हफ्ते तब साफ हुई जब AC-58 रूट पर सरकारी AC बसें चलाई गईं। यह रूट सोनारपुर को न्यू टाउन के इको स्पेस से जोड़ता है। यात्रियों को नीले रंग की बसें देखने की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें चमकीले केसरिया रंग की बसें दिखीं।
सोनारपुर रूट के एक दिन बाद, दक्षिण 24 परगना के घटकपुर और हावड़ा के संतरागाछी के बीच चलने वाली एक नई प्राइवेट बस सर्विस भी केसरिया-सफेद रंग में सड़कों पर उतरी।
बता दें कि लाल रंग लंबे समय से वामपंथी राजनीति से जुड़ा रहा है और केसरिया रंग बीजेपी की पहचान है। नीला रंग तृणमूल का आधिकारिक रंग नहीं है, फिर भी नीला-सफेद रंग तृणमूल के 15 साल के शासन की पहचान बन गया था।
ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर अर्जुन सिंह ने कहा कि कोलकाता का ट्रांसपोर्ट नेटवर्क समय के साथ बदलना चाहिए। केसरिया रंग न सिर्फ तेजी से काम करने वाली ‘डबल-इंजन’ सरकार को दिखाता है, बल्कि यह आधुनिकीकरण और पर्यावरण के अनुकूल ट्रांसपोर्ट सिस्टम की ओर बदलाव का भी प्रतीक है। यह एक प्रगतिशील रीब्रांडिंग है, जिसका मकसद कोलकाता को साफ-सुथरी और आधुनिक ट्रांसपोर्ट पहचान देना है।
वेस्ट बंगाल ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन और साउथ बंगाल स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के वर्कशॉप में यह बदलाव चुपचाप तेजी से हो रहा है। यात्रियों के ई-टिकट पर डिजिटल वॉटरमार्क का रंग भी नीले से बदलकर केसरिया कर दिया गया है।
सरकारी अधिकारी इस विज़ुअल बदलाव पर सावधानी से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। WBTC के एक अधिकारी ने कहा कि राज्य के ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के रंग-रूप को स्थायी रूप से बदलने का कोई औपचारिक नीतिगत फैसला नहीं लिया गया है।
रंगो की राजनीति बन गई है चर्चा का विषय
ट्रांसपोर्ट सेक्टर से जुड़े कई लोग इस बदलाव को आलोचना की नजर से देखते हैं। उनका कहना है कि दिखावटी बदलावों की वजह से सिस्टम की गहरी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
ट्रांसपोर्ट यूनियन के नेता तपन दास ने कहा कि हर नई सरकार ट्रांसपोर्ट बेड़े को अपने राजनीतिक ब्रांड के लिए बिलबोर्ड की तरह इस्तेमाल करती है। लेकिन रंग को नीले से केसरिया करने से ड्राइवर और मेंटेनेंस स्टाफ की भारी कमी जैसी समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता।
प्रशासन को बसों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए
रोज़ाना सफर करने वालों के लिए राजनीतिक प्रतीकों से ज़्यादा जरूरी है ट्रांसपोर्ट सर्विस का भरोसेमंद होना। पिछले दशक में सरकारी कॉरपोरेशन की बसों की संख्या में कमी आई है। IT प्रोफेशनल अनिर्बान दत्ता, जो रोज गरिया और सेक्टर V के बीच आते-जाते हैं, का कहना है कि रंग-रूप से ज़्यादा समय की पाबंदी मायने रखती है। अगर बस में चढ़ने के लिए 45 मिनट इंतजार करना पड़े, तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि बस नीली, लाल या केसरिया रंग की है। प्रशासन को बसों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।
‘कोलकाता बस-ओ-पीडिया’ के फाउंडर अनिकेत बनर्जी ने कहा कि जैसे पीली कैब, वैसे ही लाल सरकारी बसें कभी कोलकाता की पहचान हुआ करती थीं। सफेद और नीले रंग की बसों ने बड़ी संख्या में AC बसों के आने की शुरुआत की थी। अब, केसरिया रंग CNG युग की शुरुआत का संकेत हो सकता है। इसे महज़ एक राजनीतिक हथकंडा बनाने के बजाय, एक रीब्रांडिंग की कोशिश माना जाना चाहिए।

