यह प्रणव झा की पराजय नहीं, झारखण्ड में महागठबंधन में आने वाले तूफान की आहट है!

यह प्रणव झा की पराजय नहीं, झारखण्ड में महागठबंधन में आने वाले तूफान की आहट है!

शिवपूजन सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

रांची (Ranchi ):-सियासत की रस्सीयां बेहद नाजुक होती है, न जाने कितने सियासतदानों के ख्वाब इसमे लटकर ख़ुदकुशी कर ली. राजनीति में अंतिम सत्य कुछ भी नहीं होता बल्कि हलात सत्ता के लिए अपना खेल खेलते और खिलवाते रहती है.


झारखण्ड के राज्य सभा चुनाव में रस्सा- कस्सी दों सीटो के लिए थी, जेएमएम प्रत्याशी बैद्यनाथ राम की जीत टो तय थी, आखिरकर आसानी से जीते बिना किसी मशक्कत और मेहनत के.


असल लड़ाई दूसरी सीट को लेकर थी, एकतरफ भाजपा समर्थित निर्दलीय परिमल नाथवानी थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रणव झा. कयासों के बाजार में नाथवानी तो पहले ही विजेता थे और विजयी हुए भी एकदम सटीक 28 विधयको का वोट पड़ा, जबकि प्रणव झा 20 मत ही ला सके, अगर देखे तो कांग्रेस उम्मीदवार कही से भी टिके नहीं, बल्कि कोई चुनौती ही नहीं दें सके, आसानी से बिना टक्कर के ही हार गए.बेशक चुनाव से पहले महागठबंधन की एकजुटता की कसरत और क्वायद खूब हुई. जीत की बयार बही और वायदे दिखलाई पड़े, लेकिन मैदाने ए जंग में अपनों ने ही ऐसा जख्म, सिला और शिकवे दिए.

अपनों के ही भीतरघात का आघात कांग्रेस प्रत्याशी को काफ़ी जोर लगा. यहां साफ -साफ था की क्रॉस वोटिंग हुई, दग़ाबाजी और धनबल का खेल दिखा. सारी चिज़े अंदर -अंदर हुई, लेकिन सच तो यही है कि नाथवानी निर्दलीय होकर भी तीसरी बार झारखण्ड का राजयसभा चुनाव जीते . साथ ही साबित भी कर गए कि उनकी जुगत -जुगाड़ का कोई तोड़ नहीं.

कांग्रेस के झारखण्ड प्रभारी राजू ने इस हार के लिए सरकार में शामिल राजद और माले पर बेईमानी और धोखा देने का आरोप लगाया. लेकिन जेएमएम पर कोई आरोप और आक्षेप नहीं लगाए. आखिर सावल है कि कांग्रेस झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर क्यों कुछ नहीं बोली? और न ही इस हार का जिम्मेदार ठहराया?. जबकि हकीकत यह थी कि हेमंत सोरेन के नेतृत्व में ही यह राजयसभा चुनाव के महासमर में कूदे थे. एक़ अटूट भरोसा जताया गया था. क्या ये साथ -साथ का सिर्फ नाटक, दिखावा और दर्शन मात्र था? क्या खेल पहले से तय था यह फिर अंदर ही अंदर आगे कोई बड़ा खेल होने वाला है? क्या ये राजयसभा चुनाव का परिणाम कोई बड़े सियासी बवंडर और तूफान आने के संकेत है?

सवालात तो कई सियासी जमात और आवाम के बीच घूमकर तरह -तरह की बातों को जन्म दें रहीं है, जिसकी चर्चा और सारगोंशियां होते ही रहेगी. क्योंकि कांग्रेस की हार कोई छोटा मसला नहीं बल्कि महागठबंधन की करारी शिकस्त है.जिसके घरोंदे और घर की दीवारो में दरार और दिल में दूरियां तो साफ -साफ बनी हुई दिखती ही है. लगता है बस मौका और दस्तूर का इंतजार है., जो कभी भी उथल -पुथल लेकर आयेगा.

कांग्रेस तो भीतरघात की आग में झुलसकर घायल हो गई है, वो करें भी तो क्या करें, क्योंकि सत्ता की इस बिसात पर आज उस मोड़ पर खड़ी है, जहां आगे कुआ और पीछे खाई है. कांग्रेस मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर हार की तोहमत लगा नहीं सकती, अगर कुछ बोली तो फिर सत्ता से बेदखल होना पड़ सकता है.

क्योंकि वो जानती है कि जेएमएम इतनी समर्थ है कि उसके बिना भी सरकार किसी तरह जुगाड़ से चला सकती है. लिहाजा कांग्रेस को तो बेकफुट पर होना ही होगा, क्योंकि एक़ मज़बूरी है. ऐसे में करें तो करे क्या, उसकी कोशिश राजद और माले को महागठबंधन से दूर करने की है, तब ही तो अपनी हार का ठीकरा दोनों पर फोड़ रहीं है. उसकी कोशिश राजद -माले को दूर कर हेमंत सोरेन के करीब रहने और सत्ता के लिए साथ बने रहने के लिए एक़ मज़बूरी पैदा करें ताकि जेएमएम के लिए कांग्रेस जरुरी के साथ -साथ विवशता बन जाए.


कांग्रेस सियासी चाल और गोटिया तो अच्छी चल रहीं है, लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहीं है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी सियासत के कच्चे खिलाडी नहीं बल्कि कांग्रेस को आईना दिखा रहें है और उस नजरअंदाजी का बदला ले रहें है, जो कांग्रेस ने उनके साथ किया है. दरअसल, कांग्रेस मौका परस्ती की राजनीति ही जेएमएमएम के साथ करती आई है.हाथ छाप झारखण्ड में तो बेमिसाल दोस्ती की नजीर पेश करती है. लेकिन इससे बाहर यानि अन्य राज्यों में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को अहमियत नहीं देती है . हाल ही में बिहार, बंगाल, असम और ओड़िशा चुनाव में तो जेएमएम को दरकिनार कर बाहर फेंक दिया


ऐसे में सीएम हेमंत कैसे चाहेंगे कि कांग्रेस उसके सर पर बैठे और उसकी ही सरकार के लिए आफत के बीज बोये. लिहाजा, जेएमएम जानती है कि शासन को चलाना और सत्ता को बरकरार रखना है तो खुद को मजबूत रखा जाए और समय -समय पर अपने सहयोगियों को अहसास दिलाया जाए कि अपनी ताकत और भरोसे पर जेएमएम है. न कोई मज़बूरी है और न किसी की मेहरबानी पर खड़े है.


राजयसभा चुनाव के बाद एक़ सच तो बाहर आ गया कि महागठबंधन के साथी साथ -साथ तो है लेकिन सत्ता के लिए. यहां हाथ तो मिल रहें है, लेकिन दिल नहीं. जो दिख रहा है, वह असल सच नहीं है.

इधर भाजपा तो इस पूरे खेल का भरपूर मजा ले रहीं है और बहुत हद तक अपनी कोशिशो में कामयाब भी होती दिख रहीं है. उसे पता है कि हेमंत सोरेन सरकार के पास जबरदस्त बहुमत है, लिहाजा इसे हटा तो नहीं सकते. लेकिन महागठबंधन के सहयोगियों जेएमएम, कांग्रेस, राजद और माले को आपस में लड़वाकर और बिखरेकर ही बात बन सकती है.

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