पत्नी से अगर कोई पति 13 दिनों तक बात नहीं करता है तो इसे क्रूरता बिल्कुल भी नहीं माना जाएगा। ये टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आत्महत्या के एक मामले में पति को बरी कर दिया। दरअसल, मस्कट (ओमान) में इंजीनियर के तौर पर काम करने वाले जयेश कन्नन की पत्नी संगीता ने 31 जनवरी 2015 को मायके में आत्महत्या कर ली थी।
मायके जाने पर पत्नी से बंद थी बातचीत
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि संगीता के अपने माता-पिता के घर चले जाने के बाद, पति ने उससे फोन पर बात करने से इनकार कर दिया था, जिससे वह मानसिक रूप से परेशान हो गई और उसने अपनी जान दे दी। ट्रायल कोर्ट ने जयेश को IPC की धारा 498A के तहत दोषी ठहराया था और उसे 10,000 रुपये के जुर्माने के साथ तीन साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी।
नहीं हो पाया आरोप साबित
मद्रास हाई कोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा व्यवहार साबित करने में नाकाम रहा, जो इस तरह की आपराधिक जवाबदेही के लिए काफी हो। कोर्ट ने कहा कि सजा का एकमात्र आधार यह था कि पति ने अपनी पत्नी से सिर्फ 13 दिनों तक बात नहीं की थी।
पेश नहीं किया गया कॉल रिकॉर्ड
बेंच ने पाया कि इस आरोप के समर्थन में भी सबूत बहुत कम थे। अभियोजन पक्ष ने जुबानी गवाही और WhatsApp रिकॉर्ड्स पर भरोसा किया था, जिनसे पता चलता था कि कोई मैसेज नहीं भेजा गया था। कोर्ट ने कहा कि ‘सिर्फ WhatsApp पर मैसेज न भेजना ही काफी नहीं है, क्योंकि बातचीत सामान्य फोन कॉल के जरिए भी हो सकती थी। पति ने तर्क दिया कि उसने अपनी पत्नी से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन उसका फोन काम नहीं कर रहा था, इसलिए उसने उसके पिता को फोन किया था। इस बात को गलत साबित करने के लिए कोई कॉल रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया।
मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य मामले में अपने पहले के फैसले का जिक्र करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि क्रूरता को लगातार/बार-बार या कम से कम समय के बहुत कम अंतराल में साबित किया जाना चाहिए। छोटी-मोटी लड़ाइयों को क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि उस दौरान कोई क्रूरता का आरोप नहीं लगाया गया और न ही साबित हुआ, जब यह जोड़ा असल में साथ रहा था। यानी 2 नवंबर 2014 को शादी से लेकर 29 नवंबर 2014 को पति के मस्कट जाने तक। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें शादी की तारीख से लेकर अपीलकर्ता के भारत से मस्कट जाने तक, अपीलकर्ता के साथ रहने के दौरान मृतक के प्रति उत्पीड़न और क्रूरता का कोई आरोप साबित हुआ हो।

