राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में भारत की संस्कृति और दुनिया के प्रति उसके नजरिए पर बात की। उन्होंने कहा कि भारत ने कभी दुनिया को जीतने के लिए अपनी सेना भेजने की कोशिश नहीं की। भारतीय जहां भी गए, वहां ज्ञान, संस्कृति और जीवन जीने के तरीके को साझा किया।
भागवत के मुताबिक, यही सोच भारत को सिर्फ एक ताकतवर देश नहीं, बल्कि ‘विश्वगुरु’ के रूप में पहचान दिलाती है।
दुनिया जीतने नहीं, ज्ञान बांटने गए भारतीय
मोहन भागवत ने कहा कि सदियों पहले जब यात्रा करना आज की तरह आसान नहीं था, तब भी भारतीय दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंचे। वे हिमालय पार करके चीन, मंगोलिया और साइबेरिया तक गए और छोटी नावों से दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचे।
उनके अनुसार, भारतीयों ने वहां जाकर किसी देश पर कब्जा करने या लोगों का धर्म बदलने की कोशिश नहीं की। उन्होंने आयुर्वेद, ज्योतिष और भारतीय जीवन मूल्यों से जुड़ा ज्ञान लोगों के साथ साझा किया।
दक्षिण-पूर्व एशिया में आज भी दिखती है भारतीय संस्कृति
भागवत ने भारतीय संस्कृति के प्रभाव का उदाहरण देते हुए दक्षिण-पूर्व एशिया का जिक्र किया। इंडोनेशिया में रामायण की परंपरा, कंबोडिया में अंगकोरवाट और थाईलैंड में रामकथा से जुड़े सांस्कृतिक प्रभाव आज भी देखने को मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि यह प्रभाव किसी एक घटना से नहीं बना, बल्कि लंबे समय तक चले व्यापार, यात्राओं, विद्वानों और स्थानीय लोगों के बीच संवाद से भारतीय संस्कृति वहां तक पहुंची।
महाशक्ति और विश्वगुरु में अंतर
मोहन भागवत ने कहा कि महाशक्ति बनने के लिए सैन्य ताकत, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्रभाव अहम माने जाते हैं, जबकि विश्वगुरु की भूमिका अलग होती है।
विश्वगुरु बनने के लिए दूसरे देशों पर दबाव डालने के बजाय ज्ञान, विचार और अच्छे आचरण के जरिए प्रभाव बनाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया की सेवा की और अपने इसी चरित्र की वजह से उसे विश्वगुरु कहा गया, महाशक्ति नहीं।
विश्वगुरु बनना सिर्फ सम्मान नहीं, जिम्मेदारी भी
भागवत की बात का एक अहम पहलू यह भी रहा कि विश्वगुरु कहलाना केवल गर्व की बात नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।
जो देश दुनिया को दिशा देने की बात करता है, उसके व्यवहार में न्याय, संवाद और सभी के प्रति सम्मान दिखाई देना चाहिए। योग, आयुर्वेद, ध्यान और भारतीय दर्शन की दुनिया में बढ़ती स्वीकार्यता को भी भारत के सांस्कृतिक प्रभाव के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।
हालांकि, भारत के इतिहास में युद्ध और सत्ता विस्तार के दौर भी रहे हैं। इसलिए पूरे इतिहास को केवल एक ही नजरिए से देखना सही नहीं होगा। भागवत ने अपने संबोधन में भारतीय सभ्यता के उस पक्ष पर ज्यादा जोर दिया, जिसमें ज्ञान और संस्कृति के जरिए दुनिया से जुड़ने की बात कही गई।

