दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत मिला पद्म भूषण सम्मान, झारखंड के लिए गौरव का क्षण

दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत मिला पद्म भूषण सम्मान, झारखंड के लिए गौरव का क्षण

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में से एक पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। मंगलवार शाम राष्ट्रपति भवन में आयोजित भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान प्रदान किया।शिबू सोरेन की ओर से उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति के हाथों पद्म भूषण सम्मान ग्रहण किया। इस गौरवपूर्ण अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी और झामुमो नेता कल्पना सोरेन भी मौजूद रहीं।

पद्म भूषण लेने के लिए व्हीलचेयर पर पहुंचीं रूपी सोरेन

शिबू सोरेन को मरणोपरांत मिले पद्म भूषण सम्मान को लेने के लिए उनकी पत्नी रूपी सोरेन व्हीलचेयर पर समारोह में पहुंचीं थीं। व्हीलचेयर पर रूपी सोरेन को देखकर उनके सम्मान में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू खुद मंच से नीचे उतरी और उनके पास आकर उन्हें शिबू सोरेन का पद्म भूषण सम्मान दिया। इसे देखकर समारोह में मौजूद सभी लोगों भी भावुक हो गए।

शिबू सोरेन को पद्म भूषण मिलना गर्व की बात

शिबू सोरेन को मिले पद्म भूषण सम्मान पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने खुशी का इजहार किया। जेएमएम प्रवक्ता मनोज पांडे ने कहा कि यह पूरे झारखंड के लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन वास्तव में ‘भारत रत्न’ के हकदार थे, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से दिए जा रहे इस सम्मान का भी स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन केवल एक नेता नहीं, बल्कि अपने आपमें एक संस्था और एक विचार हैं। उनका जीवन, संघर्ष और दर्शन आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा। उन्होंने केंद्र से मांग की कि शिबू सोरेन के जीवन संघर्ष और उनके योगदान को देश के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए ताकि नई पीढ़ी उनके विचारों और संघर्षों से प्रेरणा ले सके।

शिबू सोरेन थे एक महान व्यक्तित्व ?

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ (अब झारखंड) जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन महाजनी शोषण के खिलाफ आवाज उठाते थे। इसी संघर्ष के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। पिता की मौत ने युवा शिबू सोरेन के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा, और यहीं से उनके जीवन का रास्ता तय हो गया। 70 के दशक में उन्होंने संथाल परगना और उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में महाजनी प्रथा, भूमि हड़पने और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आंदोलन शुरू किया.

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