रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने 26 साल पुराने सड़क हादसे के मामले में मृतक के आश्रितों को बड़ी राहत दी है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक की अदालत ने मुआवजे की राशि 10.60 लाख रुपये से बढ़ाकर 32.72 लाख रुपये कर दी है।
मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने 28 अगस्त को अपना आदेश सुरक्षित रखा था। मंगलवार को फैसला सुनाते हुए अदालत ने दुर्घटना के लिए कार चालक बिमल लकड़ा को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त आधार नहीं पाए।
ट्रक चालक की लापरवाही से हुआ था हादसा
मामला 19 जून 2000 का है। रांची से जमशेदपुर जा रही एक मारुति कार को विपरीत दिशा से आ रहे ट्रक ने टक्कर मार दी थी।
हादसे में कार चला रहे बिमल लकड़ा की मौके पर ही मौत हो गई थी। निचली अदालत ने दोनों वाहनों के चालकों की साझा लापरवाही मानते हुए 60:40 के अनुपात में जिम्मेदारी तय की थी और मृतक के आश्रितों के लिए 10.60 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था।
हालांकि, हाई कोर्ट ने मामले के साक्ष्यों की समीक्षा के बाद अलग निष्कर्ष निकाला।
हाई कोर्ट ने कहा- बिमल लकड़ा की लापरवाही का साक्ष्य नहीं
अदालत ने कहा कि बिमल लकड़ा की लापरवाही साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। मामले के प्रत्यक्षदर्शी ने भी ट्रक द्वारा मारुति कार को टक्कर मारे जाने की बात कही थी।
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि बीमा कंपनी बिमल लकड़ा की लापरवाही साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी।
इसके बाद हाई कोर्ट ने दुर्घटना के लिए ट्रक चालक की लापरवाही को आधार मानते हुए मुआवजे की राशि में वृद्धि का आदेश दिया।
पत्नी और चार बेटियों को मिलेगा बराबर हिस्सा
हाई कोर्ट ने बढ़ाई गई मुआवजा राशि में मृतक बिमल लकड़ा की पत्नी और चार बेटियों को बराबर हिस्सा देने का निर्देश दिया है।
अदालत के इस फैसले से मृतक के परिवार को लंबे समय से चल रहे मामले में महत्वपूर्ण राहत मिली है। करीब 26 वर्षों बाद मुआवजा राशि बढ़ाए जाने का आदेश दिया गया है।
बीमा कंपनी को आठ सप्ताह में राशि जमा करने का निर्देश
हाई कोर्ट ने मारुति कार की बीमा पॉलिसी को केवल तृतीय पक्ष बीमा नहीं, बल्कि व्यापक पैकेज पॉलिसी माना। इसके आधार पर न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी को भी मुआवजा भुगतान के लिए उत्तरदायी ठहराया गया।
अदालत ने बीमा कंपनी को आठ सप्ताह के भीतर मुआवजे की राशि जमा करने का निर्देश दिया है। मुआवजा राशि पर दावा याचिका दाखिल करने की तिथि से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया गया है।
यदि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार छह माह के भीतर भुगतान नहीं होता है, तो ब्याज की दर बढ़कर आठ प्रतिशत हो जाएगी।

