China India War: क्या घटती आबादी चीन को भारत के खिलाफ उकसा सकती है? अरुणाचल पर माइकल रुबिन की बड़ी आशंका

China India War: क्या घटती आबादी चीन को भारत के खिलाफ उकसा सकती है? अरुणाचल पर माइकल रुबिन की बड़ी आशंका

चीन की घटती आबादी को लेकर भारत के लिए चिंता क्यों?

चीन की घटती जन्म दर, बुजुर्ग आबादी में वृद्धि और आर्थिक चुनौतियां अब वैश्विक रणनीतिक बहस का हिस्सा बन रही हैं। इसी संदर्भ में वाशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट फोरम के नीति विश्लेषण निदेशक माइकल रुबिन ने भारत की सुरक्षा को लेकर एक चिंता जताई है। संडे गार्जियन में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने आशंका व्यक्त की कि चीन अपनी घरेलू समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए बाहरी टकराव का रास्ता चुन सकता है। उनके विश्लेषण में अरुणाचल प्रदेश भारत के लिए विशेष चिंता का विषय है।

यह रुबिन का रणनीतिक आकलन है, चीन की किसी घोषित सैन्य योजना की पुष्टि नहीं। हालांकि, चीन की जनसांख्यिकीय स्थिति और भारत-चीन सीमा विवाद के बीच संभावित संबंध पर उनकी टिप्पणी ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चर्चा को नया आयाम दिया है।

2100 तक भारत और चीन की आबादी में कितना अंतर हो सकता है?

संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों के मुताबिक, भारत 2023 में आबादी के मामले में चीन से आगे निकल गया था। लेख में दिए गए अनुमान के अनुसार, वर्ष 2100 तक भारत की जनसंख्या 1.5 अरब से अधिक रह सकती है, जबकि चीन की आबादी घटकर लगभग 63.3 करोड़ तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।

चीन लंबे समय से कम जन्म दर और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की चुनौती का सामना कर रहा है। वर्ष 1980 से 2016 तक लागू रही उसकी वन चाइल्ड पॉलिसी को इस जनसांख्यिकीय बदलाव के प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भों में गिना जाता है। हालांकि, चीन की वर्तमान जनसंख्या स्थिति के पीछे कम जन्म दर, बढ़ती जीवन प्रत्याशा, सामाजिक बदलाव और परिवारों के फैसलों सहित कई कारक हैं।

घटती कामकाजी आबादी से अर्थव्यवस्था, श्रम उपलब्धता और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन जनसंख्या में गिरावट अपने आप में युद्ध या सैन्य आक्रामकता का प्रमाण नहीं है।

रूस और ईरान के उदाहरण से क्या समझाना चाहते हैं माइकल रुबिन?

अपने विश्लेषण में रुबिन रूस और ईरान के उदाहरणों का उल्लेख करते हैं। उनका तर्क है कि जनसांख्यिकीय चुनौतियों और आंतरिक दबावों से जूझ रहे देशों में राजनीतिक नेतृत्व राष्ट्रवादी मुद्दों या बाहरी टकराव का इस्तेमाल कर सकता है।

रूस की आबादी में गिरावट, कम जन्म दर और अन्य जनसांख्यिकीय समस्याएं लंबे समय से चर्चा का विषय रही हैं। रूस ने 2008 में जॉर्जिया के साथ युद्ध किया और 2014 में क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। हालांकि, इन घटनाओं को केवल जनसंख्या में गिरावट का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। इनके पीछे सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव और भू-राजनीतिक हितों सहित कई कारक थे।

इसी तरह, ईरान में जन्म दर में गिरावट को लेकर वहां के नेतृत्व ने चिंता जताई है। रुबिन इन उदाहरणों के आधार पर यह सवाल उठाते हैं कि क्या घरेलू संकटों से ध्यान हटाने के लिए कोई सरकार बाहरी संघर्ष का सहारा ले सकती है। यह एक विश्लेषणात्मक तर्क है, न कि ऐसा नियम जो हर देश पर लागू होता हो।

ताइवान के बजाय अरुणाचल प्रदेश क्यों हो सकता है चिंता का विषय?

अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं में चीन और ताइवान के बीच संभावित सैन्य संघर्ष को बड़ा जोखिम माना जाता है। लेकिन रुबिन का तर्क है कि ताइवान पर सैन्य कार्रवाई चीन के लिए अत्यधिक जोखिमपूर्ण हो सकती है, क्योंकि इसमें अमेरिका की संभावित भूमिका और ताइवान की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण होंगी।

इसके मुकाबले, उनके आकलन में चीन भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दबाव बढ़ाने या सीमित सैन्य आक्रामकता दिखाने को एक अलग विकल्प मान सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख और सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों का उल्लेख किया है।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। चीन अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है, जबकि भारत इसे अपना अभिन्न अंग मानता है। दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव और सैन्य तैनाती के कारण इन क्षेत्रों का रणनीतिक महत्व लगातार बना हुआ है।

हालांकि, यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि चीन ताइवान से पहले भारत पर हमला करने की योजना बना रहा है। रुबिन का लेख संभावित जोखिमों पर आधारित विश्लेषण है।

क्या भारत को सैन्य तैयारियां और मजबूत करनी चाहिए?

भारत की सुरक्षा तैयारियों को लेकर पूर्व सैन्य अधिकारी जेएस सोढ़ी ने भी चिंता जताई है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बातचीत के संदर्भ में उनके विचारों का उल्लेख करते हुए लेख में कहा गया है कि भारत को चीन से संभावित चुनौती को ध्यान में रखते हुए अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए।

भारत के लिए सीमा पर निगरानी, बुनियादी ढांचे का विकास, आधुनिक हथियारों की उपलब्धता और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय महत्वपूर्ण हैं। साइबर सुरक्षा, ड्रोन और निगरानी तकनीक जैसी क्षमताएं भी आधुनिक सैन्य तैयारियों का अहम हिस्सा हैं।

रुबिन ने रूस-यूक्रेन युद्ध का उदाहरण देते हुए चेताया है कि बड़े संघर्षों की आशंका को कई बार कम करके आंका जाता है। उनके मुताबिक, भारत को उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर संभावित जोखिमों को गंभीरता से लेते हुए तैयारी बनाए रखनी चाहिए।

निष्कर्ष: चीन की घटती आबादी और आर्थिक चुनौतियां उसके भविष्य को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन इनसे भारत के खिलाफ युद्ध की संभावना अपने आप सिद्ध नहीं होती। माइकल रुबिन का विश्लेषण भारत के लिए रणनीतिक सतर्कता और सैन्य तैयारी की जरूरत पर जोर देता है। वास्तविक खतरे का आकलन चीन की सैन्य गतिविधियों, कूटनीतिक फैसलों और सीमा पर घटनाक्रम के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

स्रोत संदर्भ: संडे गार्जियन में माइकल रुबिन का लेख; नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में पूर्व सैन्य अधिकारी जेएस सोढ़ी से संबंधित बातचीत का उल्लेख।

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