पटना: बिहार में सरकारी टेंडरों में कथित अनियमितताओं और धनशोधन से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच तथा पटना हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। मामला ठेकेदार रिशु श्री से जुड़ा है, जिनके खिलाफ सरकारी टेंडरों में कथित हेरफेर और अधिकारियों के साथ सांठगांठ के आरोपों की जांच चल रही है।
पटना हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान जांच एजेंसियों से कई सवाल पूछे थे। अदालत ने यह जानना चाहा कि सरकारी अधिकारियों की कथित भूमिका से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद जांच किस दिशा में आगे बढ़ी और संबंधित लोगों से पूछताछ के लिए क्या कदम उठाए गए।
रिशु श्री के मोबाइल में ‘दीपक सर’ के नाम से सेव था नंबर
मामले में सामने आए ED के हलफनामे के अनुसार, रिशु श्री के मोबाइल फोन में पूर्व मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव दीपक कुमार का नंबर ‘दीपक सर’ के नाम से सेव था। दस्तावेज में IAS अधिकारी अभिलाषा शर्मा की मनचाही पोस्टिंग के सिलसिले में रिशु श्री की दीपक कुमार से मुलाकात का भी उल्लेख किया गया है।
बताया गया है कि रोहतास, गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और समस्तीपुर जैसे जिलों में पोस्टिंग को लेकर चर्चा हुई थी। इन विवरणों ने अधिकारियों और ठेकेदार के बीच कथित संपर्कों को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
हालांकि, किसी अधिकारी का नंबर मोबाइल में सेव होना या पोस्टिंग को लेकर मुलाकात का उल्लेख अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं है। संबंधित दावों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकती है।
छह वरिष्ठ अधिकारियों के नाम और FIR को लेकर सवाल
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू वरिष्ठ अधिकारियों के नामों और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई से जुड़ा है। उपलब्ध न्यायिक विवरण के मुताबिक, ED ने 25 फरवरी 2025 को धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 66 के तहत आर्थिक अपराध इकाई को जानकारी भेजी थी। इसके बाद सरकारी टेंडरों में कथित अनियमितताओं को लेकर विशेष निगरानी इकाई (SVU) में मामला दर्ज किया गया।
अदालत के समक्ष यह सवाल उठा कि रिशु श्री के बयान और जांच से संबंधित दस्तावेजों में छह वरिष्ठ अधिकारियों के नाम सामने आने के बावजूद संबंधित FIR में केवल तीन अधिकारियों का उल्लेख क्यों किया गया। अदालत ने जांच एजेंसियों से यह स्पष्ट करने को कहा कि अन्य अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल किस तरह हुई और उनके संबंध में क्या कदम उठाए गए।
यह सवाल जांच की निष्पक्षता और व्यापकता से जुड़ा है। हालांकि, किसी दस्तावेज में नाम आने मात्र से किसी व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता साबित नहीं होती।
हाईकोर्ट ने जांच के दायरे पर मांगा स्पष्टीकरण
सितंबर 2026 में सामने आए न्यायिक विवरण के अनुसार, पटना हाईकोर्ट ने रिशु श्री से जुड़े मामले में ED से 16 सवालों पर जवाब मांगा था। अदालत ने जांच के आधार, उपलब्ध साक्ष्यों और सरकारी अधिकारियों की कथित भूमिका की पड़ताल से जुड़े पहलुओं पर स्पष्टीकरण चाहा।
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि यदि सरकारी टेंडरों में बड़े स्तर पर हेरफेर हुआ है, तो क्या यह केवल एक व्यक्ति के जरिए संभव था या इसमें दूसरे लोगों की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए। अदालत ने जांच एजेंसी से अधिकारियों के संबंध में उपलब्ध जानकारी और आगे की कार्रवाई का विवरण मांगा।
अदालत की टिप्पणियों का अर्थ यह नहीं है कि आरोपित अधिकारियों के खिलाफ अपराध सिद्ध हो गया है। इनका उद्देश्य जांच से जुड़े सवालों पर स्पष्टता हासिल करना और उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे की कार्रवाई की स्थिति समझना है।
अभिलाषा शर्मा और योगेश कुमार सागर पर भी हुई कार्रवाई
कथित टेंडर घोटाले की जांच के दौरान बिहार सरकार ने मई 2026 में IAS अधिकारी अभिलाषा कुमारी शर्मा और योगेश कुमार सागर को निलंबित किया था। दोनों अधिकारियों पर मामले में कथित अनियमितताओं से जुड़े आरोप सामने आए थे। बाद में विशेष निगरानी इकाई ने जुलाई 2026 में दोनों अधिकारियों के आवासों सहित कई स्थानों पर तलाशी भी ली।
इन कार्रवाइयों के बावजूद जांच का दायरा, अन्य अधिकारियों से पूछताछ और आरोपों से जुड़े साक्ष्यों की स्थिति अहम बनी हुई है। किसी अधिकारी के निलंबन या आवास पर तलाशी को दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
सम्राट चौधरी सरकार के सामने जवाबदेही का सवाल
इस पूरे प्रकरण ने सरकारी टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता, अधिकारियों की जवाबदेही और जांच एजेंसियों के बीच समन्वय को लेकर बहस तेज की है। सवाल यह है कि क्या सभी संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की समान रूप से जांच हो रही है और क्या जांच की प्रगति के बारे में अदालत को पर्याप्त जानकारी दी जा रही है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए इस मामले में पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल, आगे की कानूनी कार्यवाही और जांच एजेंसियों के जवाब से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन लोगों की भूमिका के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं।
नोट: इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोपों को सिद्ध अपराध नहीं माना जाना चाहिए। संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।

