पटना: बिहार विधान परिषद में मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता दीपक प्रकाश के मनोनयन के बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और टिप्पणीकारों ने संविधान के अनुच्छेद 171(5) की भावना के पालन को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विधान परिषद की मनोनीत सीटों का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को सदन तक पहुंचाना था, जबकि व्यवहार में इन सीटों का उपयोग राजनीतिक नियुक्तियों के लिए अधिक होता दिखाई देता है।
अनुच्छेद 171(5) का दिया जा रहा हवाला
आलोचकों का कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171(5) के अनुसार राज्यपाल उन व्यक्तियों को विधान परिषद के लिए मनोनीत कर सकते हैं, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन या समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव हो। उनका तर्क है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य चुनावी राजनीति से इतर विशेषज्ञों को कानून निर्माण की प्रक्रिया में शामिल करना था।
इसी आधार पर दीपक प्रकाश के मनोनयन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं और यह कहा जा रहा है कि मनोनयन प्रक्रिया संविधान की मूल भावना के अनुरूप होनी चाहिए।
राजनीतिक नियुक्तियों पर उठे सवाल
इस मुद्दे को उठाने वालों का दावा है कि वर्तमान में बिहार विधान परिषद की मनोनीत सीटों पर बड़ी संख्या में सक्रिय राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले सदस्य हैं। उनका कहना है कि विशेषज्ञों, साहित्यकारों, कलाकारों और अन्य क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों की अपेक्षा राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दिए जाने की परंपरा बढ़ी है।
हालांकि इस विषय पर सरकार या संबंधित पक्ष की ओर से इस आलोचना पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पूर्व मनोनयनों का भी हो रहा उल्लेख
बहस के दौरान कुछ पूर्व मनोनीत सदस्यों का भी उल्लेख किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि पहले विधान परिषद में स्वतंत्रता सेनानियों, साहित्यकारों और कला जगत से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी मनोनीत किया जाता रहा है। उनका मत है कि भविष्य में भी मनोनयन की प्रक्रिया संविधान की भावना के अनुरूप विशेषज्ञों को प्रतिनिधित्व देने वाली होनी चाहिए।
राजनीतिक बहस का विषय बना मनोनयन
दीपक प्रकाश के मनोनयन के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बन गया है। एक पक्ष मनोनयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और संविधान की मूल भावना के पालन की मांग कर रहा है, जबकि इस विषय पर अंतिम निर्णय और संवैधानिक व्याख्या संबंधित प्राधिकारों के अधिकार क्षेत्र में आती है।
फिलहाल यह मुद्दा बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज हो सकती हैं।

