टीएमसी छोड़ने वाले तीन सांसदों ने अमित शाह से की मुलाकात, SIR और लाउडस्पीकर बैन पर हुई चर्चा

टीएमसी छोड़ने वाले तीन सांसदों ने अमित शाह से की मुलाकात, SIR और लाउडस्पीकर बैन पर हुई चर्चा

पश्चिम बंगाल में टीएमसी से बगावत करने वाले तीन सांसद अबू ताहिर खान, यूसुफ पठान और खलीलुर्रहमान ने गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) और लाउडस्पीकर बैन जैसे मुद्दों पर चर्चा की।

टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में हुए शामिल

ये तीनों उन 20 सांसदों में शामिल हैं, जिन्होंने विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद टीएमसी छोड़ दी थी और एनसीपीआई में शामिल हो गए थे। एनसीपीआई ने एनडीए को समर्थन दिया है। हालांकि, इन सांसदों को अभी तक लोकसभा स्पीकर से एनसीपीआई सांसद के रूप में आधिकारिक मंजूरी नहीं मिली है।

वापसी की अटकलों के बीच हुई मुलाकात

हाल ही में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि अल्पसंख्यक बहुल सीटों से जीतकर आए अबू ताहिर खान, यूसुफ पठान और खलीलुर्रहमान एनडीए में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं और वे दोबारा टीएमसी में लौट सकते हैं।

हालांकि, एनसीपीआई के अन्य सांसदों ने इन दावों को खारिज कर दिया। इसी बीच इन तीनों सांसदों की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।  

खलीलुर्रहमान ने कहा, ”हमने दो मुद्दों पर बातचीत की. पहला हमने अमित शाह के सामने कहा कि SIR में जो मामले ट्रिबिनल में है उसको लेकर जल्दी समाधान किया जाए.” उन्होंने कहा, ”दूसरा कोई भी धर्मस्थल हो उस पर लाउडस्पीकर लगा है अगर वो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक है तो उनको बजने देना चाहिए.”

चिट्ठी में क्या लिखा?

तीनों सांसदों ने इन मांगों से जुड़ी चिट्ठी भी अमित शाह को सौंपी. इसमें लिखा है, ”बड़ी संख्या में ऐसे वास्तविक मतदाता हैं जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और वे ट्रिब्यूनल के फैसले का इंतजार कर रहे हैं. इस देरी के कारण पासपोर्ट सत्यापन, भूमि पंजीकरण और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने में कठिनाइयां हो रही हैं.

चिट्ठी में लिखा है, ”मैं मंत्रालय से अनुरोध करता हूं कि सभी लंबित वास्तविक मामलों का तेजी से निपटारा किया जाए और उन्हें इस साल के अंत तक पूरा किया जाए. ट्रिब्यूनल की अतिरिक्त बेंच स्थापित की जाएं। शिकायतों की निगरानी के लिए एक तंत्र (मैकेनिज्म) बनाया जाए. यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रभावित वास्तविक नागरिकों को उनके मामले लंबित रहने के दौरान आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं से वंचित न किया जाए.”

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