कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के 52 आपराधिक मामलों को वापस लेने के फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले में जवाब देने का निर्देश भी दिया है। मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के. एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने यह आदेश एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिया। यह याचिका वकील गिरीश भारद्वाज ने दायर की थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सरकार ने तीन वरिष्ठ मंत्रियों की सिफारिश पर इन मामलों को वापस लेने का फैसला किया, जो हाईकोर्ट के वर्ष 2025 के पहले के आदेश के विपरीत है। इस दलील को देखते हुए अदालत ने फिलहाल सरकार के फैसले पर रोक लगा दी और मामले की आगे सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया।
आपको बता दें कि अतीत में भी ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने साफ कहा था कि आपराधिक मामलों को वापस लेने या जारी रखने का अधिकार सिर्फ सरकारी वकील के पास है, कैबिनेट या सरकार के पास नहीं. सरकार के वकील ने इस मामले पर अपना जवाब (objections) दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा. अदालत ने गृह विभाग और अभियोजन एवं सरकारी मुकदमों के विभाग को भी नोटिस जारी करने का आदेश दिया. इसके बाद सुनवाई को 28 सितंबर तक के लिए टाल दिया गया.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री यू टी खादर को इस केस में तीसरा प्रतिवादी बनाने की बात कही गई थी. कोर्ट ने कहा, “मंत्री ने यह बयान विधानसभा में दिया था, इसलिए उन्हें इस मामले में प्रतिवादी नहीं बनाया जा सकता.”
याचिकाकर्ता ने खादर को प्रतिवादी इसलिए बनाया था क्योंकि खादर ने गृह विभाग को एक चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी में उन्होंने कलबुर्गी जिले के अलंद थाना क्षेत्र में हुए सांप्रदायिक दंगों, गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, हत्या के प्रयास और हिजाब विरोध प्रदर्शन से जुड़े गंभीर मामलों के आरोपियों को ‘अपराधी नहीं’ बताते हुए उनके खिलाफ केस वापस लेने की मांग की थी.
आखिर क्या है पुरा मामला
राज्य कैबिनेट ने 21 मई 2026 को आम लोगों, राजनीतिक नेताओं और संगठनों के खिलाफ दर्ज 52 मामलों को वापस लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. इसके बाद, 27 मई को गृह विभाग ने एक आदेश जारी कर सरकारी वकील को इन केसों को वापस लेने का निर्देश दिया था. आरटीआई से मिले दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि अभियोजन एवं सरकारी मुकदमों के विभाग ने सरकार के इस कदम का विरोध किया था. डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन ने गृह विभाग के प्रधान सचिव को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इन मामलों में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है. आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं और कोर्ट में ट्रायल चल रहा है. इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसे मामलों को वापस लेने से जनता का कोई भला नहीं होगा.

