FIR से चार्जशीट तक सब कुछ डिजिटल, 2027 से लागू होगी नई व्यवस्था

FIR से चार्जशीट तक सब कुछ डिजिटल, 2027 से लागू होगी नई व्यवस्था

देशभर में पुलिस की जांच प्रक्रिया जल्द ही पूरी तरह डिजिटल होने जा रही है। केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि 1 जनवरी 2027 से एफआईआर दर्ज करने, जांच करने, सबूत जुटाने और चार्जशीट दाखिल करने का पूरा काम ऑनलाइन किया जाए। गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इसके लिए सभी राज्यों में 31 दिसंबर 2026 तक जरूरी तकनीकी व्यवस्था तैयार कर ली जाएगी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद पुलिस अधिकारियों की केस डायरी भी डिजिटल होगी। इससे कागज का इस्तेमाल कम होगा और जांच प्रक्रिया पहले से ज्यादा तेज, आसान और पारदर्शी बनेगी

देश में एक जुलाई 2024 से लागू हुए तीनों नए कानून बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता), बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) और बीएसए (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) के मंगलवार को दो साल पूरे हो गए। इन 730 दिनों में इन तीनों कानूनों के सभी पैटर्न पर सबसे अधिक खरा उतरने में हरियाणा ने बाजी मारी है। टॉप-5 में हरियाणा के अलावा, दूसरे नंबर पर गोवा फिर असम, चंडीगढ़ और 5वें पायदान पर पंजाब ने बाजी मारी है। इन टॉप-5 की लिस्ट में दिल्ली शामिल नहीं है। अभी भी तीनों कानून लागू होने के बाद अब तक डिजिटल प्रक्रिया अपनाने से 25 फीसदी समय की बचत हुई है।

ध्यान देने वाली बाते..

  • 31 दिसंबर तक राज्यों में जरूरी तकनीकी ढांचा तैयार होगा
  • केस डायरी, गवाहों के बयान, साक्ष्य और चार्जशीट पूरी तरह ऑनलाइन की जाएगी
  • डिजिटल प्रक्रिया अपनाने से अब तक करीब 25% समय की बचत

दो साल में 63 हजार जीरो FIR

बता दें कि दो वर्षों में देशभर में 63,572 जीरो एफआईआर दर्ज की गईं। इनमें करीब 13 हजार मामले ऐसे थे, जो दूसरे राज्यों से जुड़े थे। इस व्यवस्था के तहत पीड़ित किसी भी राज्य के किसी भी थाने में FIR दर्ज करा सकता है और बाद में मामला संबंधित राज्य या थाने को स्थानांतरित कर दिया जाता है।


चार्जशीट दाखिल करने की दर 40% से बढ़कर 61% हो गई

आपको बता दें कि सूत्रों के मुताबिक, 2024 में 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने की दर करीब 40% थी, जो अब बढ़कर 61% हो गई है। वहीं, यौन अपराधों के मामलों में दो महीने के भीतर चार्जशीट दाखिल करने की दर 2018 के 44% से बढ़कर 2025 में 75% तक पहुंच गई है। गृह मंत्रालय का मानना है कि डिजिटल जांच व्यवस्था लागू होने से जांच अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और समयबद्ध बनेगी। साथ ही दस्तावेजों की निगरानी आसान होगी, देरी कम होगी और पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाने में भी मदद मिलेगी।

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