शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बन जाते लेकिन…

शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बन जाते लेकिन…

जामताड़ा(JAMTADA):पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों किसी साधारण चुनावी लड़ाई का नाम नहीं रह गई है। यह वैचारिक संघर्ष, जातीय समीकरण, हिंदुत्व की नई व्याख्या और सत्ता के भीतर सत्ता की खोज का सैंपल फिल्ड बन चुकी है।
कभी जिस धरती पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने मानवता का गीत लिखा था। उसी धरती पर आज राजनीतिक शंखनाद गूंज रहा है। और उस शंखनाद के केंद्र में एक नाम सबसे तेज़ चमकता दिखाई देता है—

शुभेंदु अधिकारी।

राजनीति केवल लोकप्रियता से नहीं चलती। सिंहासन तक पहुँचने से अधिक कठिन होता है, सिंहासन के योग्य समझा जाना।

“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है…”

रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियाँ जैसे बंगाल की हवाओं में तैर रही थी—
“दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”

वर्ष 2021 में जब नंदीग्राम की धरती पर चुनाव हुआ। तब यह केवल एक सीट का चुनाव नहीं था। वह बंगाल की राजनीति के दो युगों का युद्ध था।

एक ओर थीं ममता बनर्जी — बंगाल की अपराजेय दुर्गा कही जाने वाली नेता। तो दूसरी ओर थे शुभेंदु अधिकारी — कभी उन्हीं के विश्वस्त सेनापति, अब सबसे बड़े विद्रोही।

मेदिनीपुर के प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार के शुभेंदु को राजनीति विरासत में मिली थी। पिता शिशिर अधिकारी दशकों तक मेदिनीपुर की राजनीति के ध्रुव रहे थे। गाँव की गलियों से लेकर कोलकाता के सत्ता गलियारों तक अधिकारी परिवार का दबदबा था।

इतिहास केवल विरासत से नहीं बनता। इतिहास तब बनता है। जब कोई व्यक्ति अपने ही बनाए घर को चुनौती देता है।

प्रेमचंद की कहानी जैसा विद्रोह

मुंशी प्रेमचंद यदि आज जीवित होते तो शायद शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा पर “घर का भेदी” जैसी कोई कहानी जरूर लिखते।

कभी ममता के सबसे भरोसेमंद साथी रहे शुभेंदु। बंगाल की सड़कों पर तृणमूल कांग्रेस के आंदोलनकारी चेहरे थे।
नंदीग्राम आंदोलन से उनका नाम उभरा।
वे जनता के बीच ऐसे उतरते थे जैसे प्रेमचंद के किसान पात्र—धूल में सने, मगर आँखों में आग लिए।

2020 आते-आते हवा बदल गई। तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष, हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण और भाजपा की आक्रामक रणनीति ने शुभेंदु को नई दिशा दी।

फिर वह दिन आया जब उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। बंगाल की राजनीति में यह केवल दल-बदल नहीं था—यह युद्ध की उद्घोषणा थी।

नंदीग्राम : जहाँ गुरु गुड़ बन गया और चेला चीनी

2021 का नंदीग्राम चुनाव भारतीय राजनीति के सबसे नाटकीय चुनावों में गिना जाएगा। पूरा देश देख रहा था—
क्या ममता बनर्जी अपनी जमीन बचा पाएंगी? या उनका सबसे भरोसेमंद सेनापति ही किला ढहा देगा?

परिणाम आया—
करीब 1900 वोटों से शुभेंदु अधिकारी विजयी हुए।

वह जीत केवल एक सीट की जीत नहीं थी। वह संदेश था कि बंगाल में भाजपा अब केवल बाहरी ताकत नहीं रही।

फिर 2026 में भवानीपुर की लड़ाई ने कहानी को और तीखा बना दिया। कहा जाने लगा कि ममता के राजनीतिक किले की दीवारों में सबसे बड़ी दरार शुभेंदु अधिकारी ने ही डाली।

राजनीति में हर विजेता राजा नहीं बनता...

यहीं से कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय शुरू होता है।

मुख्यमंत्री पद का सबसे बड़ा चेहरा बनने के बावजूद शुभेंदु अधिकारी के सामने दो बड़ी बाधाएँ खड़ी दिखाई देती हैं।

पहली चुनौती : योगी आदित्यनाथ को चुनावी मंच पर दंडवत प्रणाम करना।

समय पर खिंचा गया एक फोटो ग्रन्थ बन जाता है। कमोबेश भारतीय राजनीति में यह तस्वीरें कई बार भाषणों से अधिक बोल गया हैं।

जब मंच पर शुभेंदु अधिकारी ने योगी आदित्यनाथ को दंडवत प्रणाम किया। तब यह केवल सम्मान का दृश्य नहीं था।
यह संदेशों का महासंग्राम था।

एक ओर इससे उन लोगों को जवाब मिला जो ब्राह्मण और राजपूत के बीच राजनीतिक खाई खोजते हैं। योगी आदित्यनाथ को विरोधी अक्सर उनके पुराने नाम “अजय सिंह बिष्ट” से संबोधित करते हैं।
वे जन्म से राजपूत हैं लेकिन गोरखपीठ की परंपरा ने उन्हें ए
सन्यासी मठाधीश की पहचान दी है।

दूसरी ओर शुभेंदु का यह सार्वजनिक प्रणाम कई राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका गया।

राजनीति में झुकना केवल संस्कार नहीं होता। संकेत भी होता है। यही वह जगह है जहाँ कहानी दिल्ली तक पहुँचती है।

शाह की राजनीति : वफादारी सबसे ऊपर

अमित शाह भारतीय राजनीति के सबसे रणनीतिक नेताओं में माने जाते हैं। उन्होंने जिन राज्यों में भाजपा को विस्तार दिया। वहाँ नेतृत्व चयन में उनकी निर्णायक भूमिका रही।

राजनीति का पुराना सिद्धांत —
“सत्ता केवल लोकप्रिय व्यक्ति को नहीं मिलती। बल्कि भरोसेमंद व्यक्ति को मिलती है।”

यही कारण है कि शुभेंदु अधिकारी की बढ़ती लोकप्रियता जितनी बंगाल भाजपा को उत्साहित करती है। उतनी ही दिल्ली के रणनीतिकारों को सतर्क भी कर सकती है।

क्योंकि राजनीति में हर करिश्माई नेता भविष्य की संभावना भी माना जाता है।

दूसरी चुनौती : “जिसका साथ, उसी का विकास”

2024 में शुभेंदु अधिकारी का एक बयान अचानक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया।

उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा—

“जिसका साथ, उसी का विकास।”

यह बयान सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रसिद्ध नारे “सबका साथ, सबका विकास” से अलग स्वर माना गया।

यहीं से वैचारिक प्रश्न खड़ा हुआ—

क्या बंगाल भाजपा हिंदुत्व की अधिक आक्रामक राजनीति की ओर बढ़ रही है?
क्या शुभेंदु अधिकारी भाजपा के भीतर अलग वैचारिक धारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?

इस बयान को हिंदुत्ववादी समूहों ने खुलकर सराहा। उनकी छवि ऐसे नेता की बनी जो “स्पष्ट बोलता है” और “तुष्टिकरण के खिलाफ खड़ा है।”

लेकिन दिल्ली की राजनीति केवल भावनाओं से नहीं चलती।
उसे राष्ट्रीय संतुलन भी देखना होता है।

दुष्यंत कुमार की कविता जैसी बेचैनी

दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ जैसे इस पूरे घटनाक्रम पर सटीक बैठती हैं—

“हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”

बंगाल का हिंदू मतदाता वर्षों से वैचारिक पहचान की तलाश में था। शुभेंदु अधिकारी ने उसी बेचैनी को आवाज दी।

उन्होंने खुले मंच से कहा कि यदि मुसलमानों ने उन्हें वोट नहीं दिया तो वे हिंदुओं के लिए काम करेंगे। यह बयान समर्थकों के लिए स्पष्टवादिता था। विरोधियों के लिए ध्रुवीकरण।

लेकिन यह भी सच है कि बंगाल की राजनीति में ऐसी स्पष्ट भाषा ने उन्हें हिंदुत्ववादी समूहों का सबसे प्रिय चेहरा बना दिया।

मुख्यमंत्री की दौड़ में और कौन?

राजनीति कभी एक चेहरे पर नहीं टिकती। यदि परिस्थितियाँ बदलीं तो भाजपा के पास कई अन्य विकल्प भी मौजूद हैं।

संभावित दावेदार

दिलीप घोष

आक्रामक हिंदुत्व और संगठन पर मजबूत पकड़ वाले नेता।

सुकांत मजूमदार

संगठन के भीतर स्वीकार्य और अपेक्षाकृत संतुलित चेहरा।

समिक भट्टाचार्य

वैचारिक राजनीति और बौद्धिक छवि वाले नेता।

महिला चेहरों की संभावनाएँ

अग्निमित्रा पॉल

आक्रामक वक्तृत्व और महिला नेतृत्व की नई पहचान।

रूपा गांगुली

सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक अनुभव का मिश्रण।

क्या शुभेंदु अधिकारी बंगाल भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता हैं?
बहुत हद तक हाँ।

क्या उन्होंने ममता बनर्जी के किले को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया?
इससे भी इंकार मुश्किल है।

लेकिन क्या लोकप्रियता ही मुख्यमंत्री बनने की गारंटी है?
भारतीय राजनीति का इतिहास कहता है— नहीं।

राजनीति शतरंज है।
यहाँ केवल सबसे तेज़ घोड़ा नहीं जीतता। बल्कि वह जीतता है जिसे राजा बनने की अनुमति मिलती है।

बंगाल की इस राजनीतिक कथा में अंतिम निर्णय अभी दिल्ली के हाथों में है।

शायद इसलिए आज बंगाल की हवा में एक अनकहा प्रश्न तैर रहा है—

“कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो…”

यह भी उतना ही सच है कि पत्थर उछालने वाला हर योद्धा राजा नहीं बन पाता।

NEWSANP के लिए आर पी सिंह का रिपोर्ट

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *