नई दिल्ली: सूरज के सबसे करीब मौजूद ग्रह बुध (Mercury) धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है। वैज्ञानिकों को बुध की सतह पर ऐसी झुर्रियां और चट्टानी उभार मिले हैं, जो इस बात का संकेत देते हैं कि यह ग्रह कभी अपने मौजूदा आकार से बड़ा था और समय के साथ इसका आकार कम हुआ है।
बुध की फटी हुई सतह पर दिखाई देने वाली इन संरचनाओं को वैज्ञानिक ‘सिकुड़ने वाली संरचनाएं’ कहते हैं। कुछ चट्टानी किनारे करीब 1 मील (1.6 किलोमीटर) तक ऊंचे हो सकते हैं और सैकड़ों मील तक फैले हुए हैं। विशेषज्ञों ने बुध के लगातार सिकुड़ने की संभावना को लेकर भी चेतावनी दी है।
NASA के मुताबिक, सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह बुध सूरज से औसतन 36 मिलियन मील (58 मिलियन किलोमीटर) दूर है और सिर्फ 88 दिनों में सूरज का एक चक्कर पूरा कर लेता है। यह पथरीला ग्रह करीब 4.5 अरब साल पहले गैस और धूल के घूमते बादलों से बना था।
सौर मंडल के शुरुआती दौर में काफी हलचल थी। उस समय सूरज के आसपास घूमने वाली अंतरिक्ष चट्टानें लगातार एक-दूसरे से टकराती थीं।
विशेषज्ञों के अनुसार, नए बने ग्रह पहले से ही बेहद गर्म होते हैं। इनका तापमान ज्वालामुखी के लावे जितना हो सकता है। अंतरिक्ष में होने वाली टक्करों से निकलने वाली ऊर्जा से इन ग्रहों में और गर्मी पैदा होती है। समय के साथ जब ग्रहों से गर्मी बाहर निकलती है तो बुध जैसे ग्रहों का अंदरूनी हिस्सा सिकुड़ने लगता है।
नई रिसर्च में क्या सामने आया?
Geophysical Research Letters जर्नल में प्रकाशित एक नई स्टडी में बताया गया है कि अंतरिक्ष में हुई टक्करों से निकले मलबे ने शायद इस बात के कई सबूत छिपा दिए हैं कि समय के साथ बुध कितना सिकुड़ा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बुध के सिकुड़ने की दर को समझने से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि ग्रह का विकास कैसे हुआ और उसके अंदरूनी हिस्से में क्या बदलाव आए।
बुध के सिकुड़ने के साथ उसकी सतह पर कई दरारें बनी होंगी। जर्मन एयरोस्पेस सेंटर के प्लेनेटरी साइंटिस्ट और स्टडी के मुख्य लेखक गाकू निशियामा के मुताबिक, अरबों सालों में हुई टक्करों से बने गड्ढों और मलबे ने इनमें से कई दरारों को ढक दिया।
सूरज के बेहद करीब होने के कारण बुध का अध्ययन करना भी वैज्ञानिकों के लिए काफी मुश्किल रहा है।
डॉक्टर हेन्स बर्नहार्ड्ट के मुताबिक, पृथ्वी जैसे बड़े पथरीले ग्रहों के बनने और उनके विकास को समझने के लिए बुध काफी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, सौर मंडल के किसी और हिस्से की तुलना में बुध से इस बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं।
पहले के अनुमान से ज्यादा सिकुड़ा बुध
रिसर्च टीम ने यह अनुमान लगाने की कोशिश की कि अगर सतह पर मौजूद मलबे ने बुध की दरारों को नहीं ढका होता तो वहां कितनी सिलवटें दिखाई देतीं।
गणना के मुताबिक, बुध पहले के अनुमान से 10 से 30 फीसदी ज्यादा सिकुड़ा हो सकता है। इसका मतलब है कि ग्रह की त्रिज्या में करीब 7.2 मील (11.6 किलोमीटर) तक का बदलाव आया हो सकता है।
इससे पहले की स्टडी में बुध की त्रिज्या में करीब 0.6 से 1.2 मील (1 से 2 किलोमीटर) और कुछ अनुमानों में 4.3 मील (7 किलोमीटर) तक बदलाव की बात कही गई थी।
सिकुड़न से खुलेगा बुध के अंदर का राज
वैज्ञानिकों के लिए बुध के सिकुड़ने की मात्रा जानना काफी महत्वपूर्ण है। इससे उन्हें ग्रह के कोर और उसके ठंडा होने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिल सकती है।
अगर बुध के सिकुड़ने की मात्रा ज्यादा है तो इसका मतलब यह हो सकता है कि उसके अंदर मेटल कोर बड़ा है, कोर में सिलिकॉन जैसे हल्के तत्वों की मात्रा कम है या ग्रह के बनने के समय उसका तापमान पहले के अनुमान से ज्यादा था।
बेपीकोलंबो मिशन से मिलेगी नई जानकारी
बुध के बारे में और जानकारी हासिल करने के लिए बेपीकोलंबो मिशन महत्वपूर्ण है। करीब आठ साल की यात्रा के बाद यह मिशन बुध के पास पहुंचा है। मिशन के तहत इस साल के अंत में ग्रह के पास दो ऑर्बिटर तैनात किए जाएंगे।
स्टडी के मुख्य लेखक गाकू निशियामा के मुताबिक, मिशन बुध की सतह से जुड़े टोपोग्राफी डेटा जुटाएगा। इससे वैज्ञानिक ज्यादा सटीक तरीके से पता लगा सकेंगे कि बुध कितना सिकुड़ा है।
बेपीकोलंबो मिशन बुध की चट्टानों, गड्ढों और सतह पर मौजूद उभारों को पहले से ज्यादा स्पष्टता के साथ देखने में मदद करेगा। यह मिशन बुध की सतह की पहली व्यापक वैश्विक टोपोग्राफिक माप भी करेगा।
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