पैदल यात्रियों की सड़क हादसों में होने वाली मौतें केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्गों और शहरों के बाहर की सड़कों पर भी यह गंभीर समस्या बनी हुई है। 2019 से 2024 के बीच के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सड़क दुर्घटनाओं में पैदल चलने वालों की 1.8 लाख से अधिक मौतें दर्ज की गईं। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि इनमें सबसे ज्यादा करीब 30 प्रतिशत मौतें नेशनल हाईवे पर हुईं। वहीं, 50 लाख से अधिक आबादी वाले बड़े शहरों में इस अवधि के दौरान कुल पैदल यात्री मौतों का लगभग 12 से 13 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया। आंकड़े संकेत देते हैं कि सड़क सुरक्षा की चुनौती केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि हाईवे और अन्य सड़कों पर भी पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर कदम उठाने की आवश्यकता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक बाकी मौतें उन शहरी सड़कों पर हुईं जो 50 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों का हिस्सा नहीं हैं, और साथ ही राज्य राजमार्गों, जिला सड़कों, मुख्य सड़कों और ग्रामीण सड़कों जैसी अन्य श्रेणियों की सड़कों पर हुईं। राज्य पुलिस विभाग के मुताबिक 2019 और 2024 के बीच हर साल औसतन 30,500 से ज्यादा पैदल चलने वालों की मौत हुई। इससे पता चलता है कि सड़क का इस्तेमाल करने वालों में पैदल चलने वाले सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं।
मंत्रालय की ओर से 2024 के लिए जारी सड़क दुर्घटनाओं के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि कुल 36526 दुर्घटनाओं में से लगभग 54 % दुर्घटनाएं दो-पहिया वाहनों और कारों के साथ हुईं, जिनमें 19,680 लोगों की जान चली गई। हाल के वर्षों में भी यही ट्रेंड देखा गया है। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पता चलता है कि पैदल चलने वालों के लिए अलग और सुरक्षित फुटपाथ और क्रॉसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी ही भारत में पैदल चलने वालों की मौत का सबसे बड़ा कारण है, और यह संख्या दुनिया भर में सबसे ज्यादा है।
पैदल चलने वालों को फुटपाथ का इस्तेमाल करने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आदेश दिया है कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और सरकार को सभी सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथ बनाने के लिए कानून बनाना चाहिए। इससे पहले पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पैदल चलने वालों को फुटपाथ का इस्तेमाल करने का अधिकार मिला हुआ है।
2024 की रिपोर्ट से पता चलता है कि तमिलनाडु में पैदल चलने वालों की मौत के सबसे ज्यादा मामले (4,712) दर्ज किए गए, इसके बाद बिहार (4,149), महाराष्ट्र (3,344) और पश्चिम बंगाल (3,241) का नंबर आता है। 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 50 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में पैदल चलने वालों की मौत के 4,328 मामले दर्ज किए गए, जो इस तरह की कुल मौतों का 11.8 % था। मंत्रालय में संयुक्त सचिव के तौर पर सड़क सुरक्षा का काम देख चुके अभय दामले ने कहा कि समस्या मानकों की कमी नहीं है, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने में पूरी तरह से नाकाम रहना है।
दुर्भाग्य से, कई शहरों की सड़कें लगभग पूरी तरह से गाड़ियों के लिए बनाई गई हैं, जिससे बच्चों, बुज़ुर्गों और दिव्यांगों समेत पैदल चलने वालों को अपनी सुरक्षा को भारी जोखिम में डालकर सड़क पर चलना पड़ता है।
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक दूसरे मामले में, एक ‘एमिकस क्यूरी’ (अदालत की मदद करने वाले वकील) ने सुझाव दिया है कि सरकार हाईवे पर पैदल चलने वालों के लिए साइनबोर्ड लगाए और पैदल चलने वालों का प्रवेश वर्जित है या पैदल चलने वालों की मनाही है जैसे साइन लगाकर उन्हें आगाह करे।

