भवन का पहचान लौटी: नगर परिषद का बोर्ड जागा, या टूटी व्यवस्था की नींद ?

भवन का पहचान लौटी: नगर परिषद का बोर्ड जागा, या टूटी व्यवस्था की नींद ?

जामताड़ा(JAMTARA): मिहिजाम में इन दिनों एक अद्भुत चमत्कार की चर्चा है। यह चमत्कार न तो किसी यज्ञ से हुआ, न किसी विशेष अनुदान से, न ही किसी उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक से। यह चमत्कार हुआ ANP के एक व्यंग्यात्मक समाचार के प्रकाशन के बाद।

कुछ दिन पहले तक करोड़ों रुपये से बने नगर परिषद भवन का माथा सूना पड़ा था। भवन खड़ा था, दीवारें खड़ी थीं, खंभे खड़े थे, अधिकारी खड़े थे, जनप्रतिनिधि भी खड़े थे, लेकिन भवन की पहचान कहीं बैठी हुई थी। जिस स्थान पर “नगर परिषद मिहिजाम” का नाम होना चाहिए था, वहां एक उजड़ा हुआ निशान व्यवस्था की उदासी का विज्ञापन बना हुआ था।

फिर क्या हुआ?

एक समाचार ने विनम्रता से पूछा कि “महोदय, भवन का नाम आखिर गया कहां?” और देखते ही देखते वह नाम लौट आया। पहले दिन के उजाले में बोर्ड दिखा, फिर रात में रोशनी से जगमगाता हुआ भी दिखाई दिया। ऐसा लगा जैसे भवन स्वयं कह रहा हो — “भाइयों, मैं अभी जीवित हूं, मेरा श्राद्ध मत कीजिए।”

व्यंग्य की कलम ने वह कर दिखाया, जो फाइलें नहीं कर सकीं

लोग अब हंसते हुए कह रहे हैं कि जिस काम के लिए शायद कई आवेदन, कई निवेदन और कई स्मरण पत्र लगते, वह काम एक व्यंग्यात्मक लेख ने कर दिया।

नगर के चाय दुकानों से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा है कि यदि भवन का नाम कुछ दिनों और गायब रहता, तो अगली पीढ़ी के बच्चे पूछ बैठते —

“दादा जी, यह भवन किसका है?”

और दादा जी जवाब देते —

“बेटा, यह वही भवन है जिसका नाम खोजने के लिए कभी जांच समिति बन सकती थी।”

रामायण का एक प्रसंग और मिहिजाम की सीख

रामायण में जब भगवान श्रीराम वनवास गए, तब भी उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोड़ी। राजसिंहासन चला गया, राजमहल छूट गया, लेकिन मर्यादा नहीं छूटी। इसी कारण वे आज भी “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहलाते हैं।

श्रीराम का चरित्र हमें सिखाता है कि पद की प्रतिष्ठा भवनों, वस्त्रों या अधिकारों से नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व से बनती है।

मिहिजाम का यह प्रसंग भी कुछ ऐसा ही संदेश देता है। भवन भले करोड़ों का हो, लेकिन यदि उसकी पहचान ही मिट जाए तो उसकी भव्यता अधूरी रह जाती है। जैसे राज्य बिना धर्म के अधूरा है, वैसे ही प्रशासन बिना जवाबदेही के अधूरा है।

भगवान राम ने अयोध्या की प्रतिष्ठा बढ़ाई थी। यहां लोगों का सवाल है कि नगर परिषद की प्रतिष्ठा बढ़ाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

सब थे, लेकिन बोर्ड नहीं था!

यह भी मिहिजाम का दुर्लभ प्रशासनिक दर्शन है।

अध्यक्ष थीं।

उपाध्यक्ष थे।

माननीय वार्ड पार्षद थे।

स्थायी समितियां थीं।

बैठकें थीं।

फाइलें थीं।

मोहरें थीं।

पत्राचार था।

लेकिन भवन का नाम नहीं था।

लोग अब मुस्कुराते हुए कहते हैं कि शायद सबको यह भरोसा था कि भवन इतना बड़ा है कि उसे अपना परिचय देने की आवश्यकता ही नहीं।

जैसे कोई व्यक्ति अपना नाम भूल जाए और उम्मीद करे कि दुनिया उसे पहचानती रहे।

नगर की जनता: सबसे बड़ी ऑडिट टीम

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित किया कि जनता से बड़ा कोई ऑडिटर नहीं होता।

सरकारी ऑडिट वित्तीय अनियमितता पकड़ सकता है।

तकनीकी ऑडिट निर्माण की कमी बता सकता है।

लेकिन जनता का ऑडिट वह देख लेता है जो किसी फाइल में नहीं दिखता।

जनता ने देखा कि भवन का नाम गायब है।

जनता ने सवाल पूछा।

जनता ने चर्चा की।

और अंततः भवन का नाम वापस आ गया।

अब अगला सवाल…

नगर में लोग मजाक-मजाक में कह रहे हैं कि जब एक समाचार से भवन का नाम वापस आ सकता है, तो शायद कई अन्य समस्याओं का समाधान भी संभव है।

कहीं नालियां अपना रास्ता खोज लें।

कहीं स्ट्रीट लाइटें अपनी रोशनी याद कर लें।

कहीं फाइलें अपनी मंजिल तक पहुंच जाएं।

कहीं जनता को अधिकारियों के इंतजार में घंटे न बिताने पड़ें।

आखिर में…

नगर परिषद भवन के माथे पर अब फिर से “नगर परिषद मिहिजाम” चमक रहा है। यह अच्छी बात है। इसका स्वागत होना चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक छोटा सा बड़ा प्रश्न छोड़ दिया है—

क्या व्यवस्था को अपनी जिम्मेदारियां याद दिलाने के लिए हमेशा व्यंग्य की जरूरत पड़ेगी?

क्योंकि रामायण की सबसे बड़ी सीख यही है कि आदर्श शासन वहां होता है जहां शासक स्वयं जागृत हो। जहां जनता को बार-बार यह याद न दिलाना पड़े कि भवन का नाम क्या है, जिम्मेदारी किसकी है और मर्यादा कहां है।

मिहिजाम की जनता ने अपना काम कर दिया। उसने आईना दिखाया। अब उस आईने में दिख रही तस्वीर को सुंदर बनाए रखना नगर परिषद और उसके जिम्मेदार पदाधिकारियों की जिम्मेदारी है।

NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

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