नेपाल: नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। बाढ़ के बाद कई लोग अब भी लापता हैं। परिवार के लोग कई दिनों तक अपनों की तलाश करते रहे, लेकिन जब कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने भारी मन से उनका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया।
परंपरा के अनुसार लापता व्यक्ति की पहचान के प्रतीक के तौर पर कुश या पुआल की आकृति बनाई जाती है। इसके बाद परिवार उसी का अंतिम संस्कार करता है।
छह दिन बाद लापता सोनालाल का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार
नेपाल के पर्सा जिले के पोखरिया नगरपालिका-7 के रानीगंज निवासी सोनालाल पंडित 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ के बाद लापता हो गए थे।
परिवार ने करीब छह दिनों तक उनकी तलाश की, लेकिन जब कोई जानकारी नहीं मिली तो परिवार ने कुश से उनकी प्रतीकात्मक आकृति बनाई और भारी मन से अंतिम संस्कार कर दिया।
इसी तरह पूर्वी चंपारण के रक्सौल प्रखंड के भरतमही गांव निवासी राहुल सिंह भी बाढ़ के बाद लापता हैं। काफी तलाश के बाद भी उनका पता नहीं चलने पर परिवार ने कुश की आकृति बनाकर उनका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया।
अंतिम संस्कार की रस्में निभाना भी मुश्किल
नेपाल के बाढ़ प्रभावित इलाकों में सिर्फ लोगों की जान और घर ही प्रभावित नहीं हुए हैं, बल्कि परिवारों के लिए शोक की रस्में निभाना भी मुश्किल हो गया है।
कई परिवारों के पास रहने के लिए घर नहीं बचा है। वहीं, शोक की परंपरागत रस्में पूरी करने के लिए जरूरी जगह और पुजारी की भी कमी हो रही है।
रसुवा जिले के पहाड़बेसी के 20 से ज्यादा परिवार शोक की रस्में पूरी करने के लिए काठमांडू और आसपास के इलाकों में चले गए हैं। कई अन्य परिवार भी वहां जाने की तैयारी कर रहे हैं।
काठमांडू में भी जगह की कमी
नुवाकोट के रहने वाले बबीन रिजाल ने बुधवार को अपने माता-पिता का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार काठमांडू के पशुपतिनाथ स्थित आर्यघाट पर किया।
काठमांडू में शोक की रस्में पूरी करने के लिए बने कई सार्वजनिक स्थान पहले से ही भर चुके हैं। ऐसे में कुछ बाढ़ प्रभावित परिवारों को कमरा खाली होने का इंतजार करना पड़ रहा है।
तारकेश्वर के रुद्रमती महादेव मंदिर के क्रियापुत्री भवन में आठ समूह ठहरे हुए थे। इनमें से हर परिवार ने रसुवा की बाढ़ में अपने तीन से पांच परिजनों को खोया है।
वहीं, पास के गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के क्रियापुत्री भवन के सभी आठ कमरे भी भर चुके हैं। जगह कम पड़ने के बाद प्रबंधन को टेंट लगाने पड़े हैं।
खाने-पीने की चीजों की भी परेशानी
क्रियापुत्री भवन ऐसे स्थान होते हैं, जहां परिवार किसी सदस्य की मृत्यु के बाद करीब 13 दिनों तक शोक से जुड़ी धार्मिक रस्में पूरी करने के लिए ठहरते हैं।
सुविधा केंद्र की मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य ऋषि प्रसाद नेपाल के मुताबिक, समस्या सिर्फ रहने की जगह की नहीं है। शोक की रस्में पूरी कर रहे परिवारों को खाना बनाने के लिए गैस मिलने में भी परेशानी हो रही है।
नेपाल की बाढ़ ने कई परिवारों से उनके अपने छीन लिए हैं। जिन लोगों के शव तक नहीं मिल पाए, उनके परिवार अब परंपरा के अनुसार प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देने की कोशिश कर रहे हैं।

