दुनिया के नक्शे में कई देशों और महाद्वीपों का आकार उनकी असली स्थिति से अलग दिखाई देता है। इसे सही करने की दिशा में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक बड़ा कदम उठाया है। महासभा ने ‘Correct the Map’ प्रस्ताव को 164-1 के वोट से मंजूरी दे दी है।
इस प्रस्ताव का मकसद ऐसे नक्शों को बढ़ावा देना है, जिनमें दुनिया के अलग-अलग देशों और महाद्वीपों का क्षेत्रफल वास्तविक आकार के ज्यादा करीब दिखाई दे। हालांकि यह प्रस्ताव सभी देशों के लिए अनिवार्य नहीं है, लेकिन इससे दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
भारत ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया है। हालांकि भारतीय राजनयिक रघू पुरी ने साफ किया कि भारत ने किसी एक खास नक्शे को सही मानकर इसका समर्थन नहीं किया है। इसमें Equal Earth Projection भी शामिल है।
भारत ने कहा- किसी एक नक्शे का समर्थन नहीं
भारतीय राजनयिक रघू पुरी ने कहा कि भारत ऐसे नक्शों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के पक्ष में है, जिनमें जमीन का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही तरीके से दिखाई देता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का समर्थन Equal Earth Projection या किसी दूसरे खास नक्शे के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, पुराने नक्शों में कई देशों और महाद्वीपों का आकार वास्तविकता से काफी बड़ा या छोटा नजर आता है। समान क्षेत्रफल वाले नक्शे इस अंतर को कम कर सकते हैं।
रघू पुरी ने कहा कि किसी एक नक्शे या तरीके को सभी पर लागू करने के बजाय देशों, संस्थानों और नक्शा बनाने वाले विशेषज्ञों को अपनी जरूरत के हिसाब से विकल्प चुनने की आजादी मिलनी चाहिए।
भारत ने प्रस्ताव का समर्थन क्यों किया?
भारत का मानना है कि ऐसे नक्शों को बढ़ावा मिलना चाहिए, जिनमें देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल का वास्तविक अनुपात ज्यादा सही दिखाई दे।
रघू पुरी के मुताबिक, इससे ‘Correct the Map’ प्रस्ताव का उद्देश्य पूरा हो सकता है। साथ ही किसी एक नक्शे या तकनीक को सबसे बेहतर बताने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। भारत ने इसी सोच के आधार पर प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया है।
164 देशों ने किया समर्थन, अमेरिका ने किया विरोध
संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट किया, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया। छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
यह प्रस्ताव टोगो की ओर से लाया गया था और अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों ने इसका समर्थन किया। फ्रांस और ब्रिटेन समेत कई देशों ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया।
हालांकि यह फैसला कानूनी तौर पर सभी देशों के लिए बाध्यकारी नहीं है। इसके बावजूद इससे अलग-अलग संस्थानों और संगठनों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों को बदलने की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता खुल सकता है।
मर्केटर मैप पर क्यों उठते हैं सवाल?
मर्केटर मैप का इस्तेमाल करीब 16वीं सदी से होता आ रहा है। समुद्र में रास्ता तय करने के लिए यह नक्शा काफी उपयोगी रहा है। लेकिन इसकी एक बड़ी कमी है।
इस नक्शे में भूमध्य रेखा से जितना दूर कोई क्षेत्र होता है, वह नक्शे पर उतना ही बड़ा दिखाई देता है। यही वजह है कि मर्केटर मैप में अफ्रीका और ग्रीनलैंड लगभग एक जैसे आकार के नजर आते हैं, जबकि असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है।
इसी कारण मर्केटर मैप को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इससे लोगों को देशों और महाद्वीपों के वास्तविक आकार का सही अंदाजा नहीं मिल पाता।
Equal Earth Projection क्या है?
Equal Earth Projection एक ऐसा नक्शा है, जिसे इस तरह बनाया गया है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब दिखाई दे।
इसमें कोशिश की जाती है कि अफ्रीका, एशिया, यूरोप और दूसरे महाद्वीप नक्शे पर अपने असली क्षेत्रफल के करीब नजर आएं।
हालांकि भारत ने साफ किया है कि वह सिर्फ Equal Earth Projection को ही सही विकल्प नहीं मानता। भारत का समर्थन व्यापक सोच के लिए है, जिसमें ऐसे नक्शों का इस्तेमाल बढ़ाने की बात है जो जमीन के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाते हैं।

