आज हम सभी भारत के महान सपूत डॉ. भीमराव अंबेडकर की 136वीं जयंती मना रहे हैं। 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में जन्मे बाबासाहेब ने अपने ज्ञान, संघर्ष और विचारों से पूरे देश को नई दिशा दी।
डॉ. अंबेडकर केवल संविधान निर्माता ही नहीं थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक, अर्थशास्त्री, न्यायविद और मानवाधिकारों के सच्चे रक्षक भी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन दलितों, पिछड़ों और वंचितों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया।
उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। बचपन में उन्हें छुआछूत और भेदभाव का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उन्होंने Columbia University और London School of Economics जैसे विश्व प्रसिद्ध संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की और अपने समय के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्तियों में शामिल हुए।
डॉ. अंबेडकर ने भारत के संविधान का निर्माण करते हुए यह सुनिश्चित किया कि देश में सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलें। वे हमेशा कहते थे कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे लागू करने वाले लोग कैसे हैं।
1953 में उन्होंने संविधान को जलाने की बात कही थी, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ यह था कि यदि संविधान का सही ढंग से पालन नहीं होगा और उसमें अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्गों की सुरक्षा नहीं होगी, तो उसका कोई महत्व नहीं रह जाएगा।
उनका यह कथन एक चेतावनी था—कि लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा जब सभी के अधिकार सुरक्षित होंगे।
डॉ. अंबेडकर और महात्मा गांधी के विचारों में भी मतभेद थे। जहाँ गांधी जी जाति व्यवस्था में सुधार चाहते थे, वहीं अंबेडकर इसे पूरी तरह समाप्त करना चाहते थे। उनका मानना था कि सच्ची समानता तभी संभव है जब समाज से जातिगत भेदभाव खत्म हो।
डॉ. अंबेडकर ने हमें “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” का संदेश दिया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कठिनाइयों के बावजूद यदि हम दृढ़ संकल्प और शिक्षा का सहारा लें, तो किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
अंत में, आइए हम सभी संकल्प लें कि हम उनके बताए रास्ते पर चलेंगे, समानता, न्याय और भाईचारे के मूल्यों को अपनाएंगे और एक मजबूत एवं समावेशी भारत का निर्माण करेंगे।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

