UP(यूपी) : TVF Music पर मनोज तिवारी के स्वर में एक सोहर सुन रहा था। जिसके बोल है- हमारा बुझाता बबुआ डीएम होइहे, ए राजाजी राज के सिंगार CM होइहे, ओहु से बढ़ PM होइहे हो…। यह सोहर मसहूर वेब सीरीज पंचायत के तीसरे सीजन में आया है। जो अमेजन प्राइम वीडियो पर आया है। काफी सुना और पिछले चार-एक वर्षों से एक भोजपुरी सोहर वायरल हुआ था। कुछ हेर फेर के साथ इस गीत को कथा वाचक राजन जी महाराज ने जब अपने प्रवचन में गाया था तो अचानक यह गीत लोकप्रिय हो गया। सोशल मीडिया की भाषा में वायरल हो गया। कुछ जोड़ घटाव के साथ और भी गायकों ने इस गीत को गाया है। लेकिन वह आनंद कहा ! इस गीत पर रिल्स बनने लगे। छोटे-बड़े वीडियो बनने लगे।
पैरोडी बनने लगे। लेकिन आपको पता है, इस गीत के असली लेखक और गायक कौन है! शायद पता भी होगा! इस गीत के ओरिजिनल गायक स्व. गायत्री ठाकुर है। पचासों जोड़ी झाल और पचेक जोड़ी ढोलक तथा बैंजो मास्टर के साथ गाया यह सोहर पारंपरिक लोक धुन पर आधारित है। इसे महिलाएं अपने अन्दाज में गाती है- ‘मचियां बैठले सासु अरज गुनवा गावेली हो…’ बहरहाल, गायत्री ठाकुर ने जो सोहर गाया है, उसे लिखा है- शिवानंद मिश्र शिकारी जी ने। TVF Music ने अपने डिस्क्रिप्शन में ऑरिजिनल कंपोजिशन क्रेडिट में गायत्री ठाकुर का नाम दिया है। गीत लेखक का नाम भी गायत्री ठाकुर बताया है। जबकि इस गीत के लेखक का नाम है- शिवानंद मिश्र उर्फ शिकारी जी।
भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से लगभग 40 किलोमीटर दूर परसौड़ा टोला नामक गाँव के निवासी है शिवानंद मिश्र । गायत्री ठाकुर बिहार के बक्सर के सिमरी प्रखंड के डुभा नामक गाँव के निवासी रहे। उन्होंने तुलसीदास के रामचरितमानस को भोजपुरी में बेहद सरल अन्दाज में गाया है। गायत्री ठाकुर को मानस मर्मज्ञ के नाम से जाना जाता रहा। इसके अलावा उन्होंने महाभारत के अधिकतर प्रसंगों को भोजपुरी में गाया है। जो काफी लोकप्रिय हुए। काफी सुना गया। गायक गुलाब शर्मा और धुरान काका के साथ दुगोला गायन खूब सुना जाता था। सराहा जाता था।
दोनों एक दूसरे पर बेहद आत्मीयता से छिंटाकशी करते थे। गायत्री अक्सर कहते थे कि मज़ाक सामने वाले को अच्छा लगे तभी करना चाहिए। मार्च 2014 को निधन से पहले तक गायत्री के सामने कोई गायक उस औरा का नही हुआ। बाद में भी नहीं आ पाया। उनके शिष्य तो बहुत हुए। मगर उनकी गरिमा को बरकरार नही रख पाए। वे बाजारू हो गये। कार्यक्रम में ही गाली-गलौज करने लगे। एक बार बक्सर रेलवे स्टेशन पर गायत्री और गुलाब का दुगोला मुकाबला हो रहा था।
धुरान ने एक गीत में कुछ असहज करने वाले शब्द प्रयोग कर दिये। गायत्री ने कहा- ‘नाम धुरान ह गायत्री के सार के, गाली दिहल ना ह काम कलाकार के..।’ गायत्री गीत-गवनई में शब्दों को के प्रयोग पर बहुत ध्यान देते थे। उनमें लय था। वे चिंतन और विषय को किनारे नही करते थे। वे कार्यक्रमों में भाषा और उसकी सुचिता का ख्याल रखते थे। दर्शक-श्रोताओं के दबाव में स्त्री विरोधी और अश्लील गीत नहीं गाते थे। अभद्र दर्शकों को डपटने और चेतनाशील बनाते थे। वे तपाक से जवाब भी देते थे। विगत वर्ष एक और भोजपुरी गीत लोकप्रिय हुआ है। उस गीत को गायत्री ठाकुर ने ही गाया है। गीत के बोल है- ‘चलत डगरिया पीरा जाला पाँव रे, जोंहियो से दूर बा बलमुआ के गाँव रे…।’
इस गीत को लक्ष्मण दुबे उर्फ लहरी बाबा ने ही लिखा है। लहरी जी बक्सर के नियाजीपुर के निवासी है। वे कहते थे कि यह गीत असल में शैलेन्द्र का लिखा और मुकेश का गाया-‘ सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है..’ का भोजपुरी भावानुवाद है। लेकिन जो असल में सोहर है, जो भोजपुरी इलाकों में बेटे के जन्म पर गाया जाता है, उसका बोल है- बबुआ हामार महाराज होइहे, राजा धिराज होइहे हे… आ ललना मुकुट में हीरा पोखराज होइहे आ सिरवा प ताज होइहे हे….।
NEWS ANP के लिए यूपी से ब्यूरो रिपोर्ट…
