धनबाद(DHANBAD)निरसा : कार्तिक मास के छठ के साथ शीत ऋतु का प्रभाव बढ़ने लगता है और चैती छठ के साथ ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव बढ़ जाता है। इस तरह से देखें तो छठ पर्व ऋतु परिवर्तन से भी संबंधित पर्व है।
ऋतुओं का परिवर्तन सूर्यदेव के कारण होता है। और सूर्य देव की कृपा से ही ऋतु अनुसार फसलों का उत्पादन होता है। इसलिए भारतीय परंपरा में कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को छठ पर्व और चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को छठ पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है। इनमें चैत मास की छठ का अपना विशेष महत्व है।
कोलांचल के साथ-साथ देश भर मे भी चैती छठ मनाई जा रही है इसी के तहत चिरकुंडा,कुमारधुबी,निरसा एवं मैथन में भी बड़े ही हरसोउल्लास के साथ ब्रत मनाया जा रहा है, कार्तिक माह की तरह चैती छठ में भी स्त्रियां संतान और परिवार की सलामती अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए 36 घंटे का निर्जला व्रत करती हैं।
चैती छठ की सबसे खास बात यह है कि इसे नवरात्रि के छठे दिन मनाते हैं। इस दिन देवी के छठे रूप देवी कात्यायनी की पूजा होती है। जबकि नहाय खाय के दिन देवी के कूष्मांडा रूप की पूजा होती है। खरना के दिन कुमार कार्तिकेय की माता देवी स्कंद माता की पूजा होती है।
इसलिए चैत्र नवरात्रि के दौरान जो श्रद्धालु चैती छठ का व्रत रखते हैं उन्हें छठ मैय्या के साथ देवी स्कंदमाता, कूष्मांडा और कात्यायनी देवी का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत से बल, आरोग्य, समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
NEWS ANP के लिए निरसा से संतोष की रिपोर्ट..
