अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने संबंधी कानून के इस्तेमाल को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया है। इस फैसले से भारत को फिलहाल राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि भारतीय रिफाइनरियां अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी तेल का आयात करती रही हैं।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ट्रंप ने यह कदम अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रूबियो की भारत यात्रा से कुछ घंटे पहले उठाया। हालांकि, उन्होंने भविष्य में इस प्रावधान के तहत कार्रवाई करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा है। ऐसे में यह फैसला स्थायी राहत की गारंटी नहीं देता।
भारत-अमेरिका संबंधों और ऊर्जा कारोबार पर क्या होगा असर?
रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की आशंका भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों के लिए चुनौती बनी हुई थी। इस फैसले को टालने से दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग और व्यापार वार्ता के लिए अनुकूल माहौल बनने की उम्मीद है।
भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति का आधार देश की जरूरतें, उपलब्धता और व्यावसायिक हित हैं। कच्चे तेल की खरीद से जुड़े फैसलों में ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, अमेरिकी सरकार के पास भविष्य में शुल्क संबंधी प्रावधान लागू करने का विकल्प बने रहने के कारण भारतीय तेल कंपनियों को आगे की नीतिगत स्थिति पर नजर रखनी होगी।
भारत ने अमेरिकी शुल्क प्रस्ताव का किया था विरोध
रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर दंडात्मक शुल्क लगाने के प्रस्ताव का भारत ने पहले विरोध किया था। भारत का पक्ष रहा है कि इस तरह के कदम द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं और देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर बाहरी दबाव नहीं होना चाहिए।
रूसी तेल पर निर्भरता को लेकर पिछले कुछ महीनों में भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ने की चर्चा रही है। ऐसे में शुल्क संबंधी कार्रवाई टलने से भारतीय रिफाइनरियों को फिलहाल राहत मिल सकती है। लेकिन भविष्य में अमेरिकी नीति में बदलाव होने पर तेल आयात की लागत और खरीद रणनीति प्रभावित हो सकती है।
GTRI विशेषज्ञ ने फैसले को बताया अस्थायी राहत
अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर शोध करने वाली संस्था ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, अमेरिकी फैसले से भारत को राहत तो मिली है, लेकिन इससे व्यापार नीति की अनिश्चितता भी सामने आती है। उनका तर्क है कि अमेरिका जरूरत और अपने हितों के आधार पर दंडात्मक कदमों को लागू करने या टालने का फैसला कर सकता है।
श्रीवास्तव ने उपलब्ध आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जुलाई में भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 44 प्रतिशत रह गई। उनके अनुसार, भारत ने अधिक कीमत के बावजूद अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से भी ज्यादा तेल खरीदा।
उन्होंने आगाह किया कि संबंधित कानून बने रहने के कारण भारत को भविष्य में अमेरिकी दबाव बढ़ने की संभावना के लिए तैयार रहना चाहिए। उनके मुताबिक, भारत को व्यावसायिक शर्तों पर तेल खरीदते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भारत के लिए आगे क्या है चुनौती?
अमेरिका का ताजा फैसला भारत के लिए अल्पकालिक राहत माना जा सकता है, लेकिन रूसी तेल खरीद पर अनिश्चितता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। भारत को एक ओर कच्चे तेल की स्थिर आपूर्ति और कीमतों का संतुलन बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को भी आगे बढ़ाना है।
आने वाले समय में दोनों देशों की बातचीत और अमेरिकी प्रशासन की नीतियां तय करेंगी कि रूसी तेल की खरीद पर भारत को कितनी स्थिरता मिलती है। फिलहाल, अतिरिक्त शुल्क संबंधी कदम टलने से भारतीय ऊर्जा क्षेत्र को राहत की उम्मीद है, लेकिन इसे स्थायी समाधान मानना जल्दबाजी होगी।

