नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद ग्लेशियरों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। बताया जा रहा है कि नेपाल में आई अचानक बाढ़ के पीछे ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटने की संभावना जताई गई है। इसी बीच हिंदू कुश हिमालय के तेजी से पिघलते ग्लेशियर चिंता का बड़ा कारण बन गए हैं।
ICIMOD की 21 मार्च 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 के बाद हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार लगभग दोगुनी हो गई है।
ग्लेशियरों की बर्फ तेजी से घट रही है
रिपोर्ट के अनुसार, 1975 से अब तक इस क्षेत्र के ग्लेशियरों की बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी आई है।
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से ज्यादा ग्लेशियर हैं। ये ग्लेशियर एशिया की 10 बड़ी नदियों को पानी देते हैं। इन नदियों पर करीब 200 करोड़ लोगों की पानी, खेती और रोजी-रोटी निर्भर है।
1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में करीब 12% की कमी आई है। वहीं, बर्फ के कुल भंडार में भी करीब 9% गिरावट दर्ज की गई है।
छोटे ग्लेशियर सबसे ज्यादा खतरे में
रिपोर्ट में बताया गया है कि 0.5 वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियर सबसे तेजी से पिघल रहे हैं। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के करीब 75% ग्लेशियर इसी श्रेणी में आते हैं।
इन ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पहाड़ी इलाकों में भविष्य में पानी की कमी बढ़ सकती है। इसके अलावा ग्लेशियरों से बनी झीलों के अचानक फटने यानी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का खतरा भी बढ़ सकता है।
नेपाल में हाल की बाढ़ के संदर्भ में भी ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता जताई जा रही है।
ग्लेशियरों की निगरानी भी बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों के मुताबिक, इतने बड़े क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से बदल रहे हैं, लेकिन उनकी निगरानी अभी भी बहुत कम है।
पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में केवल 38 ग्लेशियरों की नियमित निगरानी की जा रही है। इनमें भी सिर्फ 7 निगरानी केंद्र वैश्विक मानकों के मुताबिक पर्याप्त माने जाते हैं।
कराकोरम, सिक्किम, जांस्कर और भूटान जैसे कई इलाकों में ग्लेशियरों से जुड़ा पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है।
भविष्य के लिए बढ़ सकती है मुश्किल
ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना सिर्फ पहाड़ी इलाकों की समस्या नहीं है। इसका असर नीचे रहने वाली बड़ी आबादी पर भी पड़ सकता है।
ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी में बदलाव से पीने के पानी, खेती और बिजली उत्पादन पर असर पड़ सकता है। वहीं, ग्लेशियल झीलों के फटने से अचानक बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।
नेपाल की हालिया बाढ़ ने एक बार फिर इस पूरे क्षेत्र में ग्लेशियरों की निगरानी और आपदा से पहले चेतावनी देने की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत सामने रखी है।

