नई दिल्ली। 15 अगस्त 2026 का स्वतंत्रता दिवस कर्नल जे. के. सिंह के लिए एक यादगार अनुभव बन गया। उन्हें नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले से स्वतंत्रता दिवस समारोह की राष्ट्रीय कमेंट्री करने का अवसर मिला। तीन दशक से अधिक समय तक भारतीय सेना में सेवा दे चुके कर्नल जे. के. सिंह ने इस अनुभव को केवल पेशेवर उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र को करीब से महसूस करने का अवसर बताया।
लाल किले में प्रवेश के साथ महसूस हुआ इतिहास
कर्नल जे. के. सिंह ने अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि समारोह से पहले अंधेरे में लाल किले के परिसर में प्रवेश करना उनके लिए बेहद भावुक क्षण था। परिसर में सुरक्षा व्यवस्था, सैन्य बैंड और समारोह की तैयारियां चल रही थीं। इस बीच लाल पत्थरों से बनी ऐतिहासिक इमारतों को देखकर उन्हें भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृतियां महसूस हुईं।
लाल किले की प्राचीर तक पहुंचने के बाद उनके मन में यह विचार आया कि कभी इसी स्थान पर विदेशी शासन का प्रतीक दिखाई देता था और आज उसी जगह स्वतंत्र भारत का तिरंगा पूरी गरिमा के साथ लहराता है। उनके अनुसार, यह दृश्य अपने आप में भारत की स्वतंत्रता यात्रा की कहानी कहता है।
राष्ट्रीय कमेंट्री का मिला महत्वपूर्ण अवसर
स्वतंत्रता दिवस समारोह की सुबह करीब साढ़े छह बजे कर्नल जे. के. सिंह ने राष्ट्रीय कमेंट्री की जिम्मेदारी संभाली। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए अतिथियों और दर्शकों का स्वागत करते हुए उन्होंने महसूस किया कि यह सामान्य मंच नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की भावनाओं से जुड़ा ऐतिहासिक अवसर है।
उन्होंने बताया कि उनकी कमेंट्री केवल समारोह के क्रम की जानकारी देने तक सीमित नहीं थी। उनके लिए यह लाल किले, तिरंगे और स्वतंत्रता दिवस से जुड़ी भावनाओं को शब्द देने का माध्यम भी थी।
इस दौरान ‘वंदे मातरम्’ की पोशाक में बच्चों की मौजूदगी ने भी उनका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने इसे नई पीढ़ी की राष्ट्र के प्रति भावना से जोड़कर देखा।
‘वंदे मातरम्’ और सैन्य अनुशासन ने बनाया माहौल विशेष
कर्नल जे. के. सिंह के अनुसार, इस वर्ष लाल किले से ‘वंदे मातरम्’ का गायन उनके लिए विशेष अनुभव रहा। इसके अलावा सम्मान गारद, सैन्य परंपराओं और सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने पूरे समारोह को गरिमापूर्ण स्वरूप दिया।
भारतीय सेना में साढ़े तीन दशक से अधिक समय तक सेवा कर चुके कर्नल जे. के. सिंह के लिए इन सैन्य परंपराओं को लाल किले के ऐतिहासिक वातावरण में देखना और अधिक भावपूर्ण रहा। उन्होंने कहा कि सीमा पर देश की सुरक्षा करने वाले सैनिक और लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करती आवाज की भूमिकाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन दोनों के केंद्र में कर्तव्य और राष्ट्र प्रथम की भावना है।
रक्षा मंत्री की सराहना को बताया महत्वपूर्ण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजघाट से लाल किले की ओर प्रस्थान के दौरान कर्नल जे. के. सिंह ने कमेंट्री की। उन्होंने बताया कि उस दौरान उनकी राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता दिवस की भावनाएं उनकी अभिव्यक्ति में स्वतः आती चली गईं।
उनके अनुसार, समारोह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उनकी कमेंट्री का उल्लेख करते हुए मौजूद गणमान्य लोगों के बीच उसकी प्रशंसा की। कर्नल जे. के. सिंह ने इस सराहना को अपने लिए गौरव के साथ-साथ एक जिम्मेदारी भी बताया।
उन्होंने कहा कि मिली प्रशंसा उन्हें आगे भी अपनी आवाज, अनुभव और क्षमताओं का उपयोग समाज और राष्ट्र के हित में करने के लिए प्रेरित करती है।
तिरंगे के सामने खड़े होकर महसूस हुई आजादी की कीमत
राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने के क्षण को याद करते हुए कर्नल जे. के. सिंह ने कहा कि लाल किले की प्राचीर पर तिरंगे को लहराते देखना ऐसा अनुभव था, जिसे कैमरे में कैद तो किया जा सकता है, लेकिन उसकी पूरी अनुभूति को शब्दों या तस्वीरों में समेटना कठिन है।
उन्होंने स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का अवसर बताया। उनके अनुसार, आजादी के पीछे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान है। किसी ने फांसी स्वीकार की, किसी ने जेल में वर्षों बिताए और किसी ने अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया।
कर्नल जे. के. सिंह ने कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं है। शिक्षक, किसान, वैज्ञानिक, चिकित्सक, विद्यार्थी और सामान्य नागरिक अपने-अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करके देश को मजबूत बनाते हैं।
सैनिक से कमेंटेटर तक, भावना रही राष्ट्रसेवा की
कर्नल जे. के. सिंह ने अपने अनुभव में कहा कि सेना में सेवा के दौरान उन्होंने भारत को एक सैनिक की नजर से देखा। लाल किले से राष्ट्रीय कमेंट्री करते हुए उन्हें उसी देश को एक अलग रूप में महसूस करने का अवसर मिला।
उनके अनुसार, दोनों अनुभवों के बीच एक समान सूत्र है—कर्तव्य। इसी वजह से लाल किले से की गई राष्ट्रीय कमेंट्री उनके लिए सिर्फ पेशेवर जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सैनिक जीवन की यात्रा का भी महत्वपूर्ण पड़ाव रही।
उन्होंने कहा कि लाल किले से लौटते समय उनके साथ किसी पद या प्रशंसा से अधिक एक नई जिम्मेदारी की भावना थी। यदि उनकी आवाज लोगों में देश के प्रति सम्मान पैदा कर सके, उनके अनुभव किसी युवा को प्रेरित कर सकें और उनकी क्षमताएं राष्ट्र निर्माण में काम आ सकें, तो इससे बड़ा सौभाग्य उनके लिए कुछ नहीं हो सकता।
अपने अनुभव के अंत में कर्नल जे. के. सिंह ने राष्ट्र के प्रति समर्पण का संदेश देते हुए कहा कि जिस भारत को वीरों ने अपने बलिदान से स्वतंत्र कराया, उसे अपनी निष्ठा, कर्म और क्षमताओं से मजबूत बनाना हर नागरिक का दायित्व है। उन्होंने अपने लेख का समापन “जय हिंद” के साथ किया।


