तेलंगाना हाई कोर्ट ने राज्य में तेजी से बढ़ रही ‘मुफ्त की योजनाओं’ (Freebies) की राजनीति पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सवाल किया कि जिन कल्याणकारी योजनाओं का कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है, उन पर जनता का पैसा क्यों खर्च किया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी वित्त विभाग के खिलाफ दायर एक अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान की गई। जस्टिस नागेश भीमपाका ने राज्य पर बढ़ रहे आर्थिक बोझ को लेकर चिंता जताई।
‘खतरे की घंटी बज रही है’
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागेश भीमपाका ने कहा कि स्थिति चिंता पैदा करने वाली है और ‘खतरे की घंटी बज रही है।’ उन्होंने कहा कि अगर मुफ्त योजनाओं का यह चलन इसी तरह जारी रहा तो एक समय ऐसा आ सकता है जब ‘धन के देवता कुबेर’ को भी मुफ्त की चीजों के लिए लाइन में लगना पड़ेगा।
कोर्ट ने ‘रायतू भरोसा’ और मुफ्त चावल जैसी योजनाओं की लंबे समय तक चलने की क्षमता पर भी सवाल उठाया।
करोड़पतियों को भी मिल रहा लाभ?
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ योजनाओं का लाभ ऐसे लोगों को भी मिल रहा है जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं। कोर्ट के मुताबिक, करोड़पति और महंगी मोटरसाइकिल चलाने वाले लोग भी कुछ सरकारी योजनाओं का फायदा उठा रहे हैं।
कोर्ट ने करीब 1.03 करोड़ कल्याणकारी लाभार्थियों की संख्या का जिक्र करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को योजनाओं का लाभ देने से राज्य के खजाने पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
कल्याण लक्ष्मी और शादी मुबारक पर पहले ही रोक
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब कोर्ट ने 12 अगस्त को ‘कल्याण लक्ष्मी’ और ‘शादी मुबारक’ योजनाओं पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया था।
कोर्ट ने इन योजनाओं के तहत लाभार्थियों को भुगतान रोकने के भी निर्देश दिए थे। ये योजनाएं 2014 से चल रही हैं और इनके संबंध में सरकार की ओर से जारी आठ सरकारी आदेशों (GOs) की संवैधानिक वैधता को अदालत में चुनौती दी गई है।
इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य की मुफ्त योजनाओं और उनके कारण बढ़ रहे वित्तीय बोझ पर गंभीर सवाल उठाए।
याचिकाकर्ता का क्या कहना?
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि SC, ST, अल्पसंख्यक, BC और EBC समुदायों की अविवाहित महिलाओं को आर्थिक सहायता देने वाली ये योजनाएं बिना किसी कानूनी आधार के लागू की जा रही थीं, जो संविधान के वित्तीय अनुशासन से जुड़े अनुच्छेदों का उल्लंघन है.सरकार द्वारा जवाबी हलफ़नामा दाखिल करने के लिए और समय मांगने पर, जज ने रोक का आदेश दिया और मामले की सुनवाई 9 सितंबर तक के लिए टाल दी.
सरकार, जिसने अब तक 16.78 लाख लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए 16,375 करोड़ से ज़्यादा खर्च किए हैं, ने घोषणा की है कि वह इस रोक के खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील करेगी और इसे एक अस्थायी कानूनी अड़चन बताएगी.
BC कल्याण मंत्री पोन्नम प्रभाकर ने पिछली BRS सरकार पर “खराब” सरकारी आदेश (GOs) जारी करने का आरोप लगाया और भरोसा दिलाया कि कांग्रेस सरकार उन्हें ठीक करेगी. हालांकि, 7 अगस्त को हाई कोर्ट की टिप्पणियों ने कल्याणकारी योजनाओं के लाभों को बिना सोचे-समझे बढ़ाने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे.
सरकार कर रही कल्याणकारी योजनाओं का बचाव
कोर्ट ने अयोग्य लाभार्थियों और संसाधन जुटाने के लिए जमीन बेचने पर राज्य की निर्भरता की ओर इशारा किया था. सरकार अपनी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं का बचाव करने की कोशिश कर रही है, और इसमें राजनीतिक दांव बहुत ऊंचे हैं.
कोर्ट के दखल को राज्य के कल्याणकारी मॉडल के लिए सीधी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है; जज ने खुले तौर पर सवाल किया है कि “आने वाली पीढ़ियों का भविष्य क्या है?”. जहां सरकार ने योजनाओं को जारी रखने के अपने संकल्प को दोहराया है, वहीं कानूनी और वित्तीय जांच भी तेज हो गई है. अगली सुनवाई से इन योजनाओं का भविष्य तय हो सकता है और यह भी पता चल सकता है कि सख्त न्यायपालिका के सामने सरकार अपनी ‘मुफ्त सुविधा’ वाली संस्कृति का बचाव कैसे करती है.

