अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ को मंजूरी दे दी। यह रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने वाला एक बड़ा प्रतिबंध पैकेज है। बिल को दोनों अमेरिकी पार्टियों का समर्थन मिला और यह 86-11 वोटों से पास हुआ।
इस बिल का निशाना सिर्फ रूस और ईरान ही नहीं हैं। इसमें उन देशों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है, जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल और गैस खरीदते हैं। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसे देशों से आने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है।
भारत पर भी पड़ सकता है असर
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में अगर यह बिल कानून बनता है और अमेरिकी राष्ट्रपति इसका इस्तेमाल करते हैं, तो भारत भी संभावित टैरिफ के दायरे में आ सकता है। हालांकि, टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा और इसे लागू करने का फैसला राष्ट्रपति के पास रहेगा।
बिल में राष्ट्रपति को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे राष्ट्रीय हित को देखते हुए प्रस्तावित प्रतिबंधों और टैरिफ को माफ, टाल या उनमें बदलाव कर सकते हैं।
अब आगे क्या होगा?
सीनेट से पास होने के बाद बिल अब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा। वहां मंजूरी मिलने के बाद इसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा। तभी यह कानून बन पाएगा।
पहले इस तरह के प्रस्तावों में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी, लेकिन मौजूदा बिल में अधिकतम टैरिफ की सीमा 100% रखी गई है।
प्रस्तावित कानून के तहत नई दिल्ली उन देशों में शामिल हो गई है जिन पर कड़ी नज़र रखी जाएगी. हालांकि अगर यह बिल कानून बन जाता है, तो भारत पर अपने आप टैरिफ नहीं लगेगा. यह बिल अमेरिकी प्रशासन को यह तय करने की काफी छूट देता है कि इन उपायों को लागू किया जाए या नहीं.
वॉशिंगटन और नई दिल्ली में बढ़ेंगी दूरियां
जानकारों का कहना है कि कोई भी फैसला लेते समय वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक साझेदारी को ध्यान में रखा जाएगा, जिसमें इंडो-पैसिफिक में सहयोग, रक्षा, टेक्नोलॉजी और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिशें शामिल हैं. अगर टैरिफ लगाए जाते हैं, तो इससे अमेरिका को होने वाले अरबों डॉलर के भारतीय निर्यात पर असर पड़ सकता है, जिसमें इंजीनियरिंग का सामान, दवाएं, केमिकल, टेक्सटाइल और ऑटो पार्ट्स शामिल हैं.

