‘छाती (ब्रेस्ट) दबाना और सलवार उतारने का प्रयास करना, IPC की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध है। इसे बलात्कार की कोशिश (धारा 375/376) नहीं माना जा सकता।’ पटना हाई कोर्ट ने एक मामले में निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया। 9 जुलाई को ये फैसला न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने सुनाई थी। इसकी गूंज सुप्रीम कोर्ट तक सुनाई दी।
दरअसल, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने कहा कि आपके (चीफ जस्टिस सूर्यकांत) आदेश के बाद भी ऐसा हो रहा है। इसके बाद 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट के फैसले का जिक्र किया। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हैरानी जताते गुए पटना हाई कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताई। साथ ही उन्होंने कहा कि जजों को भी कुछ रिसर्च करनी चाहिए।
‘कथित बलात्कार’ का मामला क्या है?
9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा, ‘किसी युवती को बंधक बनाना, उसकी छाती दबाना और सलवार उतारने का प्रयास करना आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध है। इसे दुष्कर्म या रेप का प्रयास नहीं माना जा सकता।’
“सलवार उतारने का प्रयास किया। बलात्कार करने की नीयत से उसकी छाती (ब्रेस्ट) दबाई। चीखें सुनकर उसके पिता दरवाजे की तरफ भागे। जिसके बाद आरोपी स्टूडियो मालिक वहां से फरार हो गया”- केस में जिक्र
दरअसल, बांका के अमरपुर थाना कांड संख्या 14/2008 में पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। अदालत ने अपीलकर्ता हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक को सभी आरोपों से बरी कर दिया। रिहाई दे दी। बांका के अमरपुर में हिमांशु पाठक की छाया नाम की फोटो स्टूडियो है।
पीड़ित लड़की ने आरोप लगाया था कि वो अपने पिता के साथ अमरपुर में छाया नाम की फोटोग्राफी स्टूडियो में गई थी। फोटो खींचाने के बाद स्टूडियो मालिक ने कंप्यूटर पर फोटो देखने के बहाने उसके पिता को बाहर इंतजार करने को कहा। जब पिता जी बाहर चले गए तो अंदर से स्टूडियो का दरवाजा बंद कर दिया। फिर उसका सलवार उतारने का प्रयास किया। बलात्कार करने की नीयत से उसकी छाती (ब्रेस्ट) दबाई। चीखें सुनकर उसके पिता दरवाजे की तरफ भागे। जिसके बाद आरोपी स्टूडियो मालिक वहां से फरार हो गया।
“छाती (ब्रेस्ट) दबाना और सलवार उतारने का प्रयास करना, IPC की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध है। इसे बलात्कार की कोशिश (धारा 375/376) नहीं माना जा सकता”- पटना हाई कोर्ट
हाई कोर्ट की चौखट पर पहुंची थी केस
इस मामले में पटना हाई कोर्ट ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य नहीं हैं। दुष्कर्म के प्रयास को साबित करने वाला कोई स्पष्ट प्रत्यक्ष सबूत भी रिकॉर्ड पर नहीं है। इसके बाद आरोपी को बरी कर दिया गया। इससे पहले बांका के अपर सत्र न्यायाधीश-1 ने 1 नवंबर 2023 को हिमांशु पाठक को IPC की धारा 376/511 के तहत दोषी ठहराया था। साथ ही तीन साल के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
निचली अदालत के इस आदेश को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। जिसमें न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने कहा कि आरोपी करीब साढ़े तीन महीने जेल में रह चुका है। वो पहले से जमानत पर है, इसलिए उसे बेल बॉन्ड से भी मुक्त किया जाता है। उसने जुर्माने की राशि जमा की है तो उसे भी रिटर्न किया जाए।
पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया
बांका के अमरपुर में फोटो स्टूडियो के अंदर घटना हुई
लड़की को बंधक बनाकर उसकी छाती दबाने का आरोप था
कमरे में बंद कर लड़के सलवार खोलने का भी आरोप था
हाई कोर्ट ने इसे लज्जा भंग माना, रेप का प्रयास नहीं
न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की पीठ ने आरोपी को बरी किया
पटना हाई कोर्ट ने किस चीज को बनाया ग्राउंड?
हाई कोर्ट ने पाया कि मामले के जांच अधिकारी (आईओ) की अदालत में गवाही नहीं कराई गई। मेडिकल करने वाले किसी डॉक्टर की गवाही भी नहीं हुई थी। रिकॉर्ड पर दुष्कर्म के प्रयास का कोई मेडिकल साक्ष्य (Medical Evidence) नहीं था। लड़की (पीड़िता) की मां घटना की प्रत्यक्षदर्शी नहीं थीं। उनकी गवाही सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थी। इस मामले में स्थानीय गवाह मोहम्मद सलाम अदालत में साफ मुकर गया। पूरा मामला पीड़ित लड़की और उसके पिता के बयानों पर आधारित था।
पटना हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दुष्कर्म के प्रयास (Attempted Rape) के लिए पेनेट्रेशन की दिशा में स्पष्ट कानूनी कृत्य (Clear Legal Act) या ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। पटना हाई कोर्ट के अनुसार अभियोजन धारा 376/511 का आरोप साबित नहीं कर सका। पटना हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी ने लड़की को स्टूडियो में बंद किया। सलवार खोलने की कोशिश की। ये आईपीसी की धारा 354 के दायरे में आता है न कि दुष्कर्म के प्रयास में।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी कमेटी की ‘न्यायिक संवेदनशीलता’ रिपोर्ट को सभी उच्च न्यायालयों की वेबसाइटों पर अपलोड करने का निर्देश दिया है। यह रिपोर्ट पिछले साल इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले के बाद तैयार की गई थी, जिसमें नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ को रेप का प्रयास नहीं माना गया था। कोर्ट का मुख्य मकसद जजों को लैंगिक अपराधों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाना है।
“जजों को भी कुछ रिसर्च करनी चाहिए। स्टाफ कुछ भी नहीं कर रहा है। एक हैंडबुक तैयार की गई है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में मुकदमा दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने में इसका ध्यान रखा जाए”-सुप्रीम कोर्ट
शीर्ष अदालत ने अदालती स्टाफ की सुस्ती पर नाराजगी जताते हुए कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों से निपटने के लिए एक खास हैंडबुक (नियमावली) तैयार की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी उच्च और अधीनस्थ अदालतें, साथ ही राज्य सरकारें और पुलिस थानें मुकदमा दर्ज करने से लेकर चार्जशीट दाखिल करने तक इस नियमावली का कड़ाई से पालन करें।

