गैंगटाक से नाला तक : एक पोस्टर ने खोल दी राजनीति की खिड़की या छेड़ दी नई बहस?

गैंगटाक से नाला तक : एक पोस्टर ने खोल दी राजनीति की खिड़की या छेड़ दी नई बहस?

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट, भाजपा संगठन और नाला की सियासत पर व्यंग्यात्मक-तथ्यात्मक रिपोर्ट..

रिपोर्ट:राणा प्रताप सिंह ,जामताड़ा

जामताड़ा (JAMTADA)राजनीति में कभी-कभी एक पोस्टर उतना काम कर जाता है, जितना कई बड़ी-बड़ी सभाएं भी नहीं कर पातीं। इन दिनों जामताड़ा जिले के नाला विधानसभा क्षेत्र में ऐसा ही एक पोस्टर चर्चा का विषय बना हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि यह पोस्टर नाला, जामताड़ा या रांची से नहीं, बल्कि हिमालय की गोद में बसे खूबसूरत शहर गैंगटाक से सोशल मीडिया पर साझा किया गया। और साझा करने वाले हैं। नाला से जुड़े सक्रिय राजनीतिक चेहरा जयंत बनर्जी।

पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा गया—

“भाजपा नाला विधानसभा क्षेत्र से जुड़े नेताओं का औकात देखिए।”

इसके बाद यह आरोपात्मक टिप्पणी कि नाला विधानसभा क्षेत्र में पार्टी कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए दूसरे विधानसभा क्षेत्रों के नेताओं को बुलाना पड़ रहा है। पहले वीरेंद्र मंडल और अब रणधीर सिंह का सहारा लिया जा रहा है।

बस फिर क्या था। पोस्टर सोशल मीडिया पर तैरता हुआ गांव की चौपाल, चाय की दुकान, व्हाट्सएप ग्रुप और राजनीतिक गलियारों तक पहुंच गया।


जब गैंगटाक की ठंडी हवा नाला की राजनीति को गर्म कर देराजनीति का यह भी एक अनोखा दौर है।

पहले नेता गांव-गांव घूमकर संदेश देते थे। अब पहाड़ों की वादियों में बैठकर फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए राजनीतिक तीर छोड़े जाते हैं।

गैंगटाक की ठंडी फिजाओं में बैठकर किया गया यह पोस्ट मानो नाला की राजनीतिक तापमान मापने का नया थर्मामीटर बन गया।

व्यंग्यकार कह सकता है कि—

“पहाड़ों में बर्फ पिघल रही थी और नाला में भाजपा का संगठनात्मक तापमान बढ़ रहा था।”


पोस्टर में उठाया गया सवाल क्या है?

यदि भावनाओं और राजनीतिक कटाक्ष को अलग रख दिया जाए, तो पोस्टर का मूल प्रश्न यह है कि—

क्या नाला भाजपा के पास अपना इतना मजबूत स्थानीय नेतृत्व नहीं है कि पार्टी कार्यक्रम स्थानीय नेताओं के दम पर संचालित हो सके?

यह एक राजनीतिक प्रश्न है और लोकतंत्र में ऐसे प्रश्न पूछे जाना अस्वाभाविक नहीं माना जाता।


सत्यानंद झा बाटुल के बाद कौन?

नाला क्षेत्र में भाजपा की चर्चा जब भी होती है तो पूर्व कृषि मंत्री सत्यानंद झा बाटुल का नाम सबसे पहले आता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि वर्षों बाद भी भाजपा को यदि अपने सबसे प्रभावशाली स्थानीय चेहरे की तलाश करनी पड़े तो यह संगठनात्मक चुनौती का संकेत हो सकता है।

दूसरी ओर भाजपा समर्थकों का तर्क है कि बड़े नेताओं का किसी कार्यक्रम में आना संगठन की कमजोरी नहीं बल्कि मजबूती का प्रतीक है।

यानी बहस के दोनों पक्ष मौजूद हैं।


वीरेंद्र मंडल और रणधीर सिंह क्यों चर्चा में?

पोस्टर में जिन नेताओं का उल्लेख है, वे झारखंड भाजपा के जाने-पहचाने चेहरे हैं।

राजनीतिक दलों में वरिष्ठ नेताओं का विभिन्न क्षेत्रों में जाना सामान्य बात है। लेकिन जब कोई स्थानीय कार्यकर्ता या नेता इसे संगठन की निर्भरता के रूप में प्रस्तुत करता है, तो चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है।

यही इस पोस्टर के साथ भी हुआ।


चाणक्य शायद मुस्कुरा रहे होंगे…

यदि चाणक्य आज होते तो शायद कहते—

“राज्य की शक्ति केवल सेनापति से नहीं, सैनिकों की तैयारी से भी मापी जाती है।”

नाला की राजनीति में यही प्रश्न बार-बार लौट रहा है कि क्या भाजपा ने अपनी दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व पर्याप्त रूप से विकसित किया है?


सोशल मीडिया का नया लोकतंत्र

एक समय था जब राजनीतिक असहमति प्रेस विज्ञप्तियों में लिखी जाती थी।

फिर समय आया जब मंचों से बयान दिए जाने लगे।

अब दौर ऐसा है कि एक पोस्टर हजार भाषणों पर भारी पड़ जाता है।

गैंगटाक से पोस्ट हुआ यह संदेश भी शायद उसी डिजिटल लोकतंत्र की उपज है।


व्यंग्य की नजर से…

नाला की राजनीति पर नजर रखने वाले एक बुजुर्ग ने हंसते हुए कहा—

“पहले लोग गंगाजल लेकर राजनीति की शपथ लेते थे, अब लोग गैंगटाक से पोस्टर डालकर राजनीतिक समीक्षा कर रहे हैं।”

दूसरे सज्जन बोले—

“लगता है हिमालय की ऊंचाई से नाला का संगठन कुछ और साफ दिखाई देता है।”

हालांकि यह केवल व्यंग्य है, तथ्य नहीं।


असली मुद्दा क्या है?

पोस्टर वायरल होने के बाद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे एक राजनीतिक चर्चा जन्मी है—

क्या नाला भाजपा में नए नेतृत्व का अभाव है?

क्या स्थानीय कार्यकर्ताओं को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं?

क्या पार्टी अभी भी पुराने चेहरों पर अधिक निर्भर है?

या फिर यह केवल आंतरिक असंतोष की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है?

इन सवालों के जवाब राजनीतिक दलों को स्वयं तलाशने होंगे।


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