
जामताड़ा(JAMTADA): मिहिजाम का नगर परिषद भवन दूर से देखने पर किसी निजी विश्वविद्यालय या चमचमाते कॉर्पोरेट दफ्तर जैसा दिखाई देता है। आसमानी रंग, ऊंची सीढ़ियां, बड़े खंभे और करोड़ों रुपये की लागत से तैयार विशाल ढांचा — सब कुछ ऐसा कि पहली नजर में आदमी कह उठे, “वाह! नगर का भविष्य सुरक्षित हाथों में है।”
लेकिन जैसे ही नजर भवन के माथे पर पड़ती है, पूरा भ्रम टूट जाता है।
जहां कभी “नगर परिषद मिहिजाम” लिखा रहता होगा, वहां अब एक उजड़ी हुई सफेद पट्टी लटक रही है। ऐसा लगता है जैसे भवन खुद अपनी पहचान खोकर सरकारी उदासी में बैठ गया हो। मानो दीवारें भी कह रही हों —
“नाम हट गया बाबू, अब काम का क्या पूछते हो!”
यह दृश्य किसी टूटी हुई तख्ती भर का नहीं है। यह उस प्रशासनिक मानसिकता का पोस्टर है,। जिसमें भवन बनाने का उत्साह तो रहता है। लेकिन उसे संभालने की जिम्मेदारी गायब हो जाती है।
करोड़ों का भवन, आत्मा किराए पर!
स्थानीय लोग बताते हैं कि इस भवन को बनाने में चालीस करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए। जनता ने सोचा था कि अब व्यवस्था आधुनिक होगी, काम समय पर होगा, लोगों को सम्मान मिलेगा। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को समझ आने लगा कि यहां “सुविधा” से अधिक “सजावट” पर ध्यान दिया गया।
नगर परिषद का यह भवन अब विकास का प्रतीक कम और सरकारी दिखावे का विवाह मंडप अधिक लगता है —
जहां रोशनी बहुत है, लेकिन भीतर व्यवस्था का जनरेटर बार-बार फेल हो जाता है।
जनता लाइन में, व्यवस्था हाई-वे में
सुबह-सुबह लोग फाइल लेकर पहुंचते हैं। कोई होल्डिंग टैक्स के लिए, कोई जन्म प्रमाणपत्र के लिए, कोई नाली-सड़क की शिकायत लेकर। सीढ़ियां चढ़ते समय उन्हें लगता है कि शायद आज काम हो जाएगा।
लेकिन अंदर पहुंचते ही लोकतंत्र की असली एक्सरसाइज शुरू होती है —
“साहब अभी नहीं आए हैं…”
“थोड़ा इंतजार कर लीजिए…”
“मीटिंग में गए हैं…”
“आज सिस्टम डाउन है…”
और अंत में जनता अपने कागजों को ऐसे समेटती है जैसे परीक्षा में फेल हुआ छात्र उत्तर पुस्तिका समेटता है।
भवन का माथा उखड़ा, भरोसा भी उखड़ा गया
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस भवन के माथे पर लगा नाम तक बचाकर नहीं रखा जा सका। करोड़ों का ढांचा खड़ा है, लेकिन पहचान गायब है। स्थानीय लोग व्यंग्य में कहते हैं कि शायद नाम इसलिए हटा दिया गया ताकि जनता सीधे पहचान न सके कि यह वही कार्यालय है जहां समस्याएं जाकर लापता हो जाती हैं।
कई बुजुर्ग तो हंसते हुए कहते हैं —
“पहले सरकारी दफ्तरों में काम गायब होता था।
अब तो दफ्तर का नाम ही गायब हो रहा है।”
अधिकारी दूर, परेशानी पास
लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि नगर की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी शहर से दूर आवासन करते हैं। जनता सुबह से कार्यालय के बाहर बैठी रहती है, जबकि व्यवस्था रास्ते में ट्रैफिक नापती रहती है।
जनता पूछ रही है —
यदि नगर परिषद चलाना है, तो नगर में रहकर चलाइए।
क्योंकि समस्याएं व्हाट्सएप लोकेशन देखकर नहीं सुलझतीं।
यह भवन नहीं, सरकारी व्यंग्य का जीवित स्मारक है
इस भवन को देखकर अब लोग कहते हैं कि यहां भ्रष्टाचार फाइलों में नहीं, दीवारों पर दिखाई देता है। ऊपर से रंगीन, भीतर से थका हुआ। जैसे किसी ने विकास पर पेंट तो कर दिया, लेकिन नींव में जवाबदेही डालना भूल गया।
और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जनता अब गुस्से से कम, हंसते हुए अधिक सवाल पूछ रही है। क्योंकि जब व्यवस्था उम्मीद तोड़ती है, तब व्यंग्य जन्म लेता है।
प्रेमचंद आज होते तो शायद मुस्कुरा देते
हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने अपने समय में व्यवस्था की कमजोरियों को कहानियों में उतारा था। आज यदि वे इस भवन को देखते, तो शायद लिखते —
“यहां दीवारें नई हैं,
लेकिन आदतें बहुत पुरानी।”
और सच भी यही दिखाई देता है।
मिहिजाम का नगर परिषद भवन केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना बन गया है जिसमें जनता अब भी दरवाजे पर खड़ी है और जवाबदेही भीतर कहीं कुर्सी खोज रही है।
NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट
