
पहले दीपिका… फिर तिशा… और अब ग्वालियर की पलक।
हर दिन कोई न कोई बेटी दहेज की आग में झोंक दी जाती है।
आखिर कब तक बेटियों के साथ ये अन्याय होता रहेगा?
दहेज आखिर है क्या?
कुछ लोग इसे “बाप का प्यार” कहते हैं,
तो कुछ “गिफ्ट” का नाम दे देते हैं।
एक पिता अपनी बेटी की खुशियों के लिए
अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगा देता है।
कर्ज़ में डूब जाता है…
सिर्फ इसलिए ताकि उसकी बेटी के ससुराल में कोई कमी न रहे।
लेकिन सवाल ये है —
अगर दहेज प्यार है, तो फिर इसकी मांग क्यों?
और अगर ये सिर्फ “बेटी का हक” है,
तो उसी हक के लिए उसकी जान क्यों ले ली जाती है?
कुछ ससुराल वाले खुलकर दहेज मांगते हैं,
तो कुछ कहते हैं —
“आप अपनी बेटी को जो देना चाहें दे दीजिए…”
लेकिन इस दिखावे के पीछे छिपी लालच
कई बेटियों की जिंदगी छीन लेती है।
हम कहते हैं —
“बहू घर की लक्ष्मी होती है…”
फिर उसी लक्ष्मी को
कुछ रुपए, सोना, गाड़ी और सामान के लिए
क्यों मार दिया जाता है?
दहेज के पैसों से आखिर कब तक घर चलाओगे?
दूसरों की बेटियों के खून से
कैसे अपने सपनों के महल बनाओगे?
समाज को समझना होगा —
आज जो किसी और की बेटी के साथ हो रहा है,
कल वही आपकी बेटी के साथ भी हो सकता है।
जिस दिन लोग दहेज लेना छोड़ देंगे,
उस दिन बेटियां बोझ नहीं, सम्मान कहलाएंगी।
और हमारे देश की बहुएं
दहेज के लिए मारी नहीं जाएंगी,
बल्कि सच में लक्ष्मी की तरह सम्मान पाएंगी।
दहेज नहीं, बेटी का सम्मान चाहिए।
दहेज प्रथा बंद करो। बेटियों को जीने दो।

