सांसद और विधायक की “राजनीतिक” दूरी को लेकर कृष्णा अग्रवाल ने साधा निशाना “धनबाद की हकीकत, अब जनता सब समझ रही है”..

सांसद और विधायक की “राजनीतिक” दूरी को लेकर कृष्णा अग्रवाल ने साधा निशाना “धनबाद की हकीकत, अब जनता सब समझ रही है”..

धनबाद (DHANBAD): झारखण्ड प्रान्तीय मारवाड़ी सम्मेलन के उपाध्यक्ष सह खुद को भाजपा समर्थक और सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता बताने वाले कृष्णा अग्रवाल ने एक बार फ़िर धनबाद के सांसद ढुल्लू महतो और विधायक राज सिन्हा के बीच बढ़े हुए “राजनीतिक दूरी” को लेकर “सोशल मीडिया” पर पोस्ट किया है…हालांकि कृष्णा अग्रवाल के निशाने पर हमेशा से धनबाद के भाजपा विधायक राज सिन्हा रहें है..और उनका एक तरफा बैटिंग को लेकर सवाल भी उठते रहें है..भाजपा के समर्थक होने के बावजूद उन्होंने खुलकर नगर निकाय चुनाव में झामुमो समर्थित मेयर प्रत्याशी सह पूर्व मेयर शेखर अग्रवाल का समर्थन किया था..वहीं लोकसभा चुनाव के दौरान मौजूदा सांसद ढुल्लू महतो का विरोध किया था..और कृष्णा अग्रवाल का कांग्रेस में उनके जाने की चर्चा जोरों पर थी..हालांकि सरयू राय के नजदीकी होने के बावजूद इन दिनों सांसद ढुल्लू महतो से कृष्णा अग्रवाल के रिश्ते मधुर है…

धनबाद में समसामयिक मुद्दो पर आधारित सोशल मीडिया पर लिखें उनके पोस्ट चर्चा में है..

“आजादी के 75+ वर्षों बाद भी धनबाद की आम जनता अपने दैनिक मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है।..

पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा—कोयलांचल धनबाद की जनता आज भी इन मौलिक अधिकारों से वंचित है।
एक ओर बढ़ते अपराध, दूसरी ओर अवैध उत्खनन के कारण लगातार हो रहा भू धंसान पिछले एक महीने में बाघमारा विधानसभा स्थित कतरास क्षेत्र के टंडाबाड़ी बस्ती से लेकर धनबाद विधानसभा के केंदुआडीह तक कई घटनाएं हुईं, कई परिवार उजड़ गए, कई लोगों ने अपनी जान गंवाई…लेकिन इसके बावजूद व्यवस्था और नेतृत्व की कार्यशैली में कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आता।

अब सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी है?
जनता अपने बहुमूल्य वोट देकर जनप्रतिनिधियों को चुनती है,
तो क्या उनके प्रति जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?
सिर्फ जनप्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन की भी उतनी ही जिम्मेदारी बनती है कि वह नागरिकों की सुरक्षा, सुविधाओं और जीवन को सुनिश्चित करे।

लेकिन हकीकत यह है कि जहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए,
वहां एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा है।
धनबाद की सबसे बड़ी समस्या अब सिर्फ संसाधनों की नहीं,
बल्कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की कार्यशैली बन चुकी है।
जहां संकट के समय एकजुट होकर समाधान निकालना चाहिए,
वहां अलग-अलग मंच, अलग-अलग दिशा और व्यक्तिगत राजनीति हावी दिखाई देती है।

जबकि सभी जनप्रतिनिधि एक ही राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी से हैं। एक ही शहर में,एक ही समय पर सांसद और विधायक के अलग-अलग कार्यक्रम कहीं पोस्टर से सांसद गायब, तो कहीं मंच से विधायक नदारद। यह कार्यशैली साफ संकेत देती है कि समन्वय से ज्यादा महत्व एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को दिया जा रहा है।

इसका सीधा असर यह है कि जनता की आवाज बंट जाती है और समस्याओं का समाधान कमजोर पड़ जाता है।
दूसरी ओर,जब जनता पानी, बिजली, सड़क, अस्पताल और सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रही हो, तो प्राथमिकताएं भी उसी हिसाब से तय होनी चाहिए। लेकिन जमीनी समस्याओं के बजाय हवाई अड्डा जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान देना यह दर्शाता है कि प्राथमिकताएं संतुलित नहीं हैं।

सबसे दुखद स्थिति यह है कि गरीब और आम जनता, जिनकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी सरकार, जनप्रतिनिधि और प्रशासन की बनती है, वही आज सबसे ज्यादा असुरक्षित और उपेक्षित है और जो जिम्मेदार हैं, वे एक-दूसरे पर आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारियों से बचने में लगे हैं और अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं।

साफ तौर पर कहा जाए तो सांसद और विधायक का पहला कर्तव्य अपने क्षेत्र की जनता के प्रति है, न कि दिखावटी योजनाओं के पीछे भागना। जब तक धनबाद की जनता को शुद्ध पेयजल, नियमित बिजली आपूर्ति, बेहतर शिक्षा, समुचित चिकित्सा सुविधा और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था नहीं मिलती, तब तक हवाई अड्डा जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स की बात करना जनता के साथ सीधा अन्याय है।

पहले हर मोहल्ले में बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित कीजिए, लोगों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन दीजिए उसके बाद ही बड़े सपनों की राजनीति कीजिए और जब ये जिम्मेदारियां पूरी हो जाएं, तब आपस में प्रतिस्पर्धा भी कीजिए—कौन बेहतर काम के आधार पर आगे बढ़ेगा, सांसद कैसे केंद्रीय मंत्री बनेगा या विधायक कैसे सांसद बनेगा लेकिन वह प्रतिस्पर्धा सेवा और परिणाम पर आधारित होनी चाहिए, न कि अधूरे काम और पब्लिसिटी के सहारे।

धनबाद की सच्चाई अब छुपी नहीं है, समस्या क्या है और कमी कहां है, यह जनता समझ चुकी है। अब जरूरत है कार्यशैली बदलने की, न कि सिर्फ बयान और दिखावे की।

“घर गिर रहे हैं…
जनता जूझ रही है…
और राजनीति पब्लिसिटी में व्यस्त है!”
अगर यही स्थिति रही,
तो सच में जनता भगवान के भरोसे ही रह जाएगी..”

NEWSANP के लिए धनबाद से कुंवर अभिषेक सिंह की रिपोर्ट

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