चारों तरफ नदी के तेज धाराओं और घने जंगलों के बिच बने टापू पर दीखता है आस्था का अद्भुत संगम
इस दरगाह से जुड़ी है कई राज्यों की गहरी आस्था और मन्नतों की कहानियां
पुरुलिया(WEST BENGAL): पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से करीब 250 किलोमीटर दूर, पश्चिम बर्दवान और पुरुलिया जिले के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित अनजाना बाबा का मजार आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है। घने जंगलों और नदी के बीच बसे इस दरगाह की खासियत सिर्फ इसकी भौगोलिक स्थिति ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी लोगों की गहरी आस्था भी है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि बिहार, झारखंड और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां सालों से अपनी हाजिरी लगाने पहुंचते हैं।
किसी के लिए यह मजार 10 साल की आस्था का केंद्र है, तो कोई 20, 30, 40 या 50 वर्षों से लगातार यहां आ रहा है। श्रद्धालु अपनी-अपनी कहानियों के साथ यहां पहुंचते हैं—कोई अपनी मुराद लेकर, तो कोई मुराद पूरी होने के बाद धन्यवाद देने। यहां आने वाले लोगों की बातें सुनकर ऐसा लगता है मानो वे किसी अपने करीबी से अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशखबरी साझा कर रहे हों।
बिहार के जमुई जिले की रहने वाली बुजुर्ग महिला मीरा देवी बताती हैं कि उनके जीवन में एक समय ऐसा था जब वे बेहद परेशान थीं और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। लेकिन जब वे अनजाना बाबा के दरगाह पहुंचीं, तो उनकी जिंदगी में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। उनकी समस्याएं दूर हो गईं और तभी से वे बाबा की मुरीद बन गईं। मीरा देवी हर वर्ष 17 अप्रैल को यहां लगने वाले मजार में आकर अपनी हाजिरी लगाती हैं और बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करती हैं।
इसी तरह जमुई की ही रहने वाली रेखा देवी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वे बताती हैं कि पारिवारिक समस्याओं के कारण उनका जीवन काफी कठिन हो गया था, यहां तक कि उन्होंने अपने पति को भी खो दिया। जब उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा, तो वे एक परिचित के साथ इस दरगाह पहुंचीं। रेखा देवी के अनुसार, यहां आने के बाद उनकी जिंदगी में स्थिरता आई और समस्याएं धीरे-धीरे खत्म हो गईं। आज वे भी इस मजार में गहरी आस्था रखती हैं।
दरगाह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लोकेशन है। यह मजार पश्चिम बर्दवान और पुरुलिया की सीमा पर स्थित डिसरगढ़ क्षेत्र में शेरशाह बाबा के मजार से महज 500 मीटर की दूरी पर, नदी के बीच एक टापू पर बना हुआ है। चारों ओर पानी और घने जंगलों से घिरा यह स्थान किसी रहस्यमयी दुनिया का अहसास कराता है। यहां तक पहुंचने के लिए कोई सीधा रास्ता नहीं है। श्रद्धालुओं को या तो नाव का सहारा लेना पड़ता है या फिर नदी में पानी कम होने पर पैदल ही पानी पार कर मजार तक पहुंचना होता है।
मजार कमिटी के सदस्य चांद खान बताते हैं कि यह दरगाह करीब 70 से 75 वर्ष पुरानी है। उनके अनुसार, उनके पूर्वजों ने इस टापू पर दो मकबरों को देखा था। इन मकबरों की पहचान को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी, लेकिन स्थानीय लोगों और शेरशाह बाबा मजार के कुछ मुजाविरों को इनके बारे में सपना आया। इसके बाद इन मकबरों की साफ-सफाई की गई और यहां जियारत शुरू हुई।
पहचान के अभाव में इन दोनों मकबरों को ‘अनजाना बाबा’ के नाम से जाना जाने लगा। धीरे-धीरे यह नाम प्रसिद्ध हो गया और लोग इन्हें इसी नाम से पुकारने लगे। स्थानीय लोगों का मानना है कि ये मकबरे किसी वली या पीर पैगंबर के हो सकते हैं। इस विश्वास को और मजबूती तब मिली, जब यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मुरादें पूरी होने लगीं।
समय के साथ इस मजार की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। आज यह दरगाह डिसरगढ़ के शेरशाह बाबा मजार की तरह ही प्रसिद्ध हो चुका है। खास मौकों पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। घने जंगलों के बीच सैकड़ों लोग दूर-दराज से यहां पहुंचते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि आस्था के आगे भौगोलिक कठिनाइयां भी छोटी पड़ जाती हैं।
अनजाना बाबा का यह मजार न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह उस विश्वास का प्रतीक भी है, जो लोगों को मुश्किल परिस्थितियों में उम्मीद देता है। यहां आने वाले हर श्रद्धालु के दिल में एक ही भावना होती है—बाबा पर अटूट विश्वास और मुराद पूरी होने की उम्मीद।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

