
जामताड़ा/पटना/दिल्ली: बिहार की राजनीति में रिश्ते जितनी तेजी से बनते हैं। उतनी ही तेजी से टूटते भी हैं—और कभी-कभी वही टूटन इतिहास की सबसे बड़ी कहानी बन जाती है। समता पार्टी के शुरुआती दिनों की एक ऐसी ही कहानी आज फिर चर्चा में है। जब अचानक पुराने किरदारों के नाम और नए घटनाक्रम एक साथ सुर्खियों में आ गए हैं।
जब जॉर्ज ने कहा—“अब दोस्ती संभव नहीं”
समता पार्टी के गठन के दस वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे कि पार्टी के वरिष्ठ नेता जॉर्ज फर्नांडिस ने एक कड़ा बयान दिया—“नीतीश के साथ दोस्ती अब इस जन्म में संभव नहीं है।”
यह कोई साधारण बयान नहीं था, बल्कि उस अंदरूनी खींचतान का सार्वजनिक विस्फोट था, जो लंबे समय से सुलग रही थी।
उस समय जॉर्ज के साथ एक और मजबूत चेहरा खड़ा था—दिग्विजय सिंह। वही दिग्विजय सिंह, जिनकी राजनीतिक विरासत आज भी जिंदा है और जिनकी पुत्री श्रेयसी सिंह वर्तमान में बिहार सरकार में मंत्री हैं।
कल शाम श्रेयसी सिंह के अचानक दिल्ली रवाना होने की खबर ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी—और यहीं से अतीत की कहानी फिर से वर्तमान में जुड़ती नजर आती है।
समता पार्टी: शुरुआत से ही दो ध्रुव
समता पार्टी के गठन के साथ ही यह दो स्पष्ट खेमों में बंट गई थी
एक तरफ नीतीश कुमार
दूसरी तरफ जॉर्ज फर्नांडिस
शुरुआत में दोनों ने मतभेदों को दबाकर पार्टी को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन अंदर की दरार कभी भरी नहीं। 2003 आते-आते यह दरार खाई बन चुकी थी।
राजनीति का मूल नियम है—पहले लाभ, फिर वर्चस्व—और यही यहां भी दिखा।
लड़ाई लालू प्रसाद यादव से थी, लेकिन अंदरूनी संघर्ष ने पार्टी को ही कमजोर करना शुरू कर दिया।
शरद यादव की एंट्री और अस्थायी शांति
स्थिति संभालने के लिए शरद यादव को बीच में लाया गया।
समझौता हुआ, जॉर्ज फर्नांडिस को अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन यह केवल सतही समाधान था।
अंदर ही अंदर सत्ता की लड़ाई जारी रही।
नीतीश की रणनीति: शांत दिखते हुए बड़ा खेल
2003–2005 के बीच नीतीश कुमार पूरी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे थे।
2005 में वे बिहार के मुख्यमंत्री बने—और यहीं से असली खेल शुरू हुआ।
NDA केंद्र में कमजोर
बिहार में नीतीश मजबूत
संगठन पर पकड़ बनाने का सही समय
नीतीश ने विकास (सड़क, बिजली, पानी) और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर अपनी लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया। अब पार्टी को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेना अगला लक्ष्य था।
2009: निर्णायक वार
लोकसभा चुनाव 2009—
यही वह साल था जब नीतीश ने अपने सबसे बड़े राजनीतिक कदम उठाए—
जॉर्ज फर्नांडिस का टिकट काट दिया गया
दिग्विजय सिंह का भी टिकट छीन लिया गया
यह सिर्फ टिकट कटना नहीं था, बल्कि समता पार्टी के पुराने नेतृत्व को किनारे लगाने की सुनियोजित रणनीति थी।
दिग्विजय सिंह: बगावत और जीत
दिग्विजय सिंह ने हार नहीं मानी।
बाँका से निर्दलीय चुनाव लड़ा
और नीतीश लहर के बावजूद जीत दर्ज की
यह जीत सिर्फ एक सीट की नहीं थी, बल्कि एक संदेश था—
“नीतीश के सामने भी कोई खड़ा हो सकता है।”
लोक मोर्चा और नई चुनौती
इसके बाद दिग्विजय सिंह ने “लोक मोर्चा” का गठन किया और नीतीश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
गांधी मैदान में किसान महापंचायत जैसे आयोजन कर वे तेजी से एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में उभर रहे थे।
लेकिन 2010 में उनकी आकस्मिक मृत्यु ने इस उभरती चुनौती को अचानक समाप्त कर दिया।
बिहार की राजनीति एक ऐसे नेता को खो बैठी, जो सीधे टक्कर देने की क्षमता रखता था।
विरासत जिंदा है… और अब फिर हलचल
दिग्विजय सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी सांसद बनीं और बाद में भाजपा का समर्थन किया।
आज उनकी पुत्री श्रेयसी सिंह बिहार सरकार में मंत्री हैं—और अब उनके राजनीतिक कद को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
कल उनका अचानक दिल्ली जाना…
आज भाजपा कोर कमेटी की बैठक का रद्द होना…
और नीतीश कुमार का पटना लौट आना…
इन सब घटनाओं ने सियासी गलियारों में एक सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या यह सिर्फ संयोग है, या फिर कोई नई राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है?
इतिहास खुद को दोहराता है?
समता पार्टी के दौर की दोस्ती, दरार और वर्चस्व की लड़ाई आज भी बिहार की राजनीति में कहीं न कहीं दिखाई देती है।
चेहरे बदल गए हैं, लेकिन खेल वही है—
सत्ता, रणनीति और समय की चाल।
फिलहाल, इन घटनाओं के बीच सीधा संबंध नजर नहीं आता, लेकिन बिहार की राजनीति में कुछ भी अचानक नहीं होता—हर कदम के पीछे एक कहानी होती है।
अब देखना यह है कि यह हलचल सिर्फ हवा है या आने वाले बड़ा बदलाव ।
NEWSANP के लिए जामताड़ा से आर पी सिंह की रिपोर्ट

