शिवपूजन सिंह /वरिष्ठ पत्रकार
बेरमो(BERMO ): आज इस बजारीकरण और तिज़ारती दौर में हर चिज़ की कीमत इस बाजार ने तय कर दी है. पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं है. ये कहावत बिल्कुल चरितार्थ है.
आज के हालात से एक दशक पहले से तुलना करेंगे तो सूचना क्रांति के ज़माने ने एक बड़ा बदलाव किया, सबकुछ अब हाथो पर ही आ गया है, तरक्की भी हुई और लोग पेशेवर भी हुए. लेकिन सच्चाई ये भी है कि ये इतना बढ़ चढ़ गया कि मानवीय मूल्य भी मिट्टी में मिल गए. भ्रष्टाचार का दीमक तो पहले से घूम ही रहा है.लेकिन एक चोरी और सिनाजोरी भी खूब हो रही है. तरह -तरह के नियम कायदे लगाकर पैसा वसूल किया ज रहा है.
खासकर जिस शिक्षा को जरुरी समझा गया और केंद्र से लेकर राज्य सरकार ने इसे लेकर तरह -तरह के नारे लगाए,अरबों खर्च किए और एजुकेशन की अहमियत को समझाया. लेकिन इनकी नजरें निजी स्कूलों के मनमानी और मनमर्जी भरे रवैये पर काभी तफ़सील से गौर नहीं फ़रमाया और न ही कभी ठीक से फ़र्ज ही अदा किया. शिक्षा के नाम पर निजी स्कूलों की लूट से सब आहत -मर्माहत है, लेकिन बच्चो के बेहतर भविष्य के खातिर सब चुप हो जाते है. उनकी मजबूरी उनके आक्रोश को दबा देती है.
आज प्राइवेट स्कूलों की मनमानी इतनी सर चढ़कर बोल रही है. जिसे जितना बोला और लिखा जाए तो वो कम पड़ जायेगा. कुछ न कुछ पैसे वसूली के लिए उपाय कर ही लेते है. अगर निजी स्कूलों में किसी बच्चे का दाखिला करवा दिए तो फिर एडमिशन से लेकर स्कूल ड्रेस, किताब कॉपी वही से ही लीजिये. मतलब स्कूल के साथ ही वहा दुकान भी है. आपको सबकुछ मिल जायेगा, कही बाहर जाने की जरुरत नहीं है. शिक्षा के नाम पर पैसे की वसूली की फूल गारंटी है.
सबसे ज्यादा बोझ तो उन अभिभावको को पड़ता है जिनके दो -तीन बच्चे है और जो मिडिल क्लास फैमली से ताल्लुक रखते है. भला सोचिये वैसे परिवारों पर क्या गुजराती होगी, जिनकी हसरत अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए तालीम देना चाहते है. अपना पेट काटकर भी बच्चों के खातिर स्कूल फी जमा करते है. सवाल है कि आखिर इन निजी स्कूलों की मनमानी को रोकने के लिए सरकार और जिला प्रशासन क्यों कदम नहीं उठाती?, क्यों कठोर नियम कायदे नहीं बनाती? क्यों शिक्षा के इन सौदागरों पर लगाम नहीं लगाती? कम से कम जिले के बड़े मुलाजिम को तो गंभीर होना चाहिए.
सवाल ढेरों है, जिसका जवाब स्कूल के प्रिंसिपल से नहीं बल्कि जिला प्रशासन, शिक्षा मंत्री और माननीय मुख्यमंत्री से मांगने की जरुरत है.
अभी स्कूलों में री -एडमिशन की बहार आई हुई है. फरमान तो ऐसा भी सुना जा रहा है कि बिना री-एडमिशन के किताब नहीं खरीद पाएंगे. सोचिये री-एडमिशन नहीं हुआ तो फिर बच्चे का तो बेक लग जायेगा. सवाल है किस लिए री-एडमिशन की जरुरत आन पड़ी? हर साल री-एडमिशन क्यों बच्चे करवाए ? सोचनीय बात ये है कि नामचीन स्कूलों में ऐसा आदेश किया जा रहा है.
जहाँ एक माता -पिता अपने बच्चों को बड़ी ख्वाहिशो से पढने के लिए भेजते है. लेकिन सोचिये जिनकी माली हालात खास्ता है, क्या उनके लिए ये मुमकिन है कि इन स्कूलों की मनमाने आदेश को माने और अपनी जेब ढीली करें.
निजी स्कूलों की मनमानी, मनमर्जी और मौकापरस्ती पर तो हर हाल में अंकुश लगना चाहिए. ये पॉकेट पर सीधे -सीधे डाका रुकनी चाहिए. जिला प्रशासन, राज्य सरकार को इसे लेकर गंभीर होना ही होगा, नहीं तो शिक्षा के नाम पर तरह -तरह के फी वसूलने का यह धंधा और हथकंडा नहीं रुकेगा.जो सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा है.
इस लूट कों रोकने के लिए एक जागरूकता और मुहिम छेड़नी होंगी. तब ही इसका समधान संभव है.

