पश्चिम बंगाल(WEST BENGAL): पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से अपने अलग तेवर और जुझारू नेताओं के लिए जानी जाती रही है। लेकिन इस बार चुनावी तस्वीर कुछ बदली-बदली नजर आ रही है।
जहां पहले पार्टियां जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को उम्मीदवार बनाती थीं, वहीं अब वंशवाद का असर साफ दिखने लगा है। चाहे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस हो, भारतीय जनता पार्टी हो, कांग्रेस हो या वाम दल—लगभग सभी पार्टियों ने इस बार परिवारवाद से दूरी नहीं बनाई है।
खासतौर पर तृणमूल कांग्रेस में कई ऐसे उम्मीदवार मैदान में हैं, जो किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े हुए हैं। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या अब राजनीति में अनुभव और संघर्ष से ज्यादा पारिवारिक पहचान मायने रखने लगी है?
इधर चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा चुका है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह और ममता बनर्जी—तीनों ही नेता लगातार रैलियां और सभाएं कर रहे हैं।
ममता बनर्जी बंगाल की अस्मिता को मुद्दा बनाकर चौथी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही हैं। वहीं भाजपा इस चुनाव को अपने लिए निर्णायक मानते हुए पूरी ताकत झोंक रही है।
चुनाव आयोग और मतदाता सूची को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। ममता बनर्जी ने जहां केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर निशाना साधा है, वहीं अमित शाह ने तृणमूल सरकार के अंत का दावा कर दिया है।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, मुकाबला सीधा तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच होता दिख रहा है।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

