बेरमो से वरिष्ठ पत्रकार शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट
बेरमो(BERMO): सियासत वो दहकती आग हैं, जहां झुलसने और जलने के लिए भी सियासतदान बेताब और बेचैन रहते हैं. सत्ता की लालसा और लोलुपता ही इसकी सबसे बड़ी वजह और कमजोरी हैं.कड़वा सच ये भी हैं सिहासन के लिए दागदार पेशानी और लहूलुहान हथेली हो जाती हैं.
.हकीकत हैं कि एकबार जब सत्ता का स्वाद लगा और नशा चढ़ा तो फिर ताउम्र नहीं उतरता.न यह मरने और न जीने ही देती हैं.
हालांकि समय की ललाट पर लिखे के सामने भला किसकी चली हैं, कई उदहारण इतिहास में अंकित हैं कि जब हुकूमत जाने और बुलंदियां ढलान पर आने लगती हैं, तो फिर यहीं सियासत बदचलन, बईमान और बेमानी हो जाती हैं.
राजनय में अगर -मगर की डगर और उतार -चढाव इसका दस्तूर और दरीचा हैं. बदलाव इसके कपाल पर मोटे -मोटे अक्षरों पर लिखा हैं.
बेरमो की राजनीति की बात करें और मौजूदा हालात पर गौर फ़रमाए तो बेरमो से कांग्रेस विधायक अनूप सिंह का सिक्का चल रहा हैं. सियासी मैदान में जब से कूदे हैं शानदार सफलता उनके दामन में आई हैं . लगातार दो बार विधायक चुने जाने के बाद फिर मेयर चुनाव में भी अपनी रणनीति और राजनीति का लोहा मनवाया.
क्या उनकी कामयाबी कुछ कहती हैं? या फिर अलग कहानी नजर आती हैं? क्या आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा? सच कहा जाए तो उनके पिता और मजदूर नेता राजेंद्र सिंह के निधन के बाद लगातार अप्रत्याशित और अचरज भरी सफलता हासिल की. 2024 के विधानसभा चुनाव में जयराम महतो की लहर और तजुर्बेकार रविंद्र पाण्डेय को मात देकर अपनी राजनीति और रणनीति का ठोस सबूत पेश किया हैं. इसमे शक की कोई गुंजाइश नहीं बचती कि नई पीढ़ी के नेताओं में अव्वल हैं.
सवाल हैं कि क्या ये विजयगाथा अपराजेय रहेगी ? क्या उनसे कोई घमासन नहीं कर पायेगा ? तो इसका जवाब हैं बिल्कुल नहीं. उनके सामने बेरमो भाजपा हमेशा चुनौती बनी रहेगी, क्योंकि 1980 में बीजेपी अपने वजूद में आने के बाद से ही कांग्रेस के गढ़ बेरमो में भी अपनी दमदार दस्तक दी थी . भाजपा से 1980 में रामदास सिंह विधायक बनें थे और यहां भगवा फहराया था.
हालांकि इसके बाद बेरमो की सियासत में समय अनूप सिंह के पिता और मजदूर नेता राजेंद्र सिंह का आया. उन्होंने भी बेरमो में 1985 से 2000 तक लगातार चार बार विधायक बने और एकछात्र राजकर अपनी राजनीति का हुनर दिखाया .
लेकिन, इसके बावजूद भाजपा बेरमो में न कमजोर पड़ी थी और न ही मैदान से बाहर खड़ी थी. दिवंगत राजेंद्र सिंह को 2005 में बीजेपी के योगेश्वर महतो बाटूल नें हराकर हाहाकार मचा दिया था. कांग्रेस और भाजपा के बीच कश्मकश और कर्कशता का दौर इस दरमियान भी चलता रहा.2009 में फिर राजेंद्र बाबू जीते तो भाजपा के योगेश्वर महतो बाटूल ने 2014 में फिर उन्हें शिकास्त दी. लेकिन फिर इसके बाद पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह ने पलटवार किया और विजयी हुए. वह आखिरी सांस तक एक जुझारू नेता और विधायक बने रहें. इसके बाद उपचुनाव में उनके बेटे अनूप सिंह जीते और अभी भी वही विधायक हैं.पिछले चार दशक में दो बार बीजेपी की जीत को छोड़ दें तो आज तक कांग्रेस का ही यहां राज काज चल रहा हैं.
सवाल हैं कि क्या कांग्रेस की कमान और विरासत को आगे भी ऐसे ही चलती रहेगी? और क्या वाकई चुनौती मिलेगी? तो इसमे कोई शक नहीं भाजपा इसके लिए मुफिद और इसके फिराक में हैं. जो विधायक अनूप सिंह को चुनौती देने के लिए तत्पर है.
मौजूदा वक्त में बेरमो भाजपा चुस्त -दुरुस्त तो दिखती हैं और अच्छा वोट शेयर भी हैं . लेकिन यहां चेहरे का संकट दिखता हैं.एक सर्वमान्य नेता का आभाव खटकता हैं. एक विपक्ष का जो किरदार भाजपा को निभाना चाहिए. वो कहीं न कहीं यहां कमजोर और कमतर दिखलाई पड़ती हैं. विधायक अनूप सिंह के कामों का लेखा -जोखा नहीं करती और न ही उतना कुछ उनके बारे में बोलती ही हैं.
यह तो हो नहीं सकता कि मौजूदा जनप्रतिनिधि की कमान में सबकुछ ठीक ही चल रहा हैं, कोई दिक्कत और कमी यहां के आवाम को नहीं हैं.
यहां बात मूतमईन हैं कि बेरमो बीजेपी मौजूदा वक्त की जन समस्याओं को ठीक ढंग से उठाती हुई नहीं दिखती, एक ख़ामोशी और चुप्पी अख्तियार किये रहती हैं.. शिक्षा, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर आवाज नहीं उठाती और न ही आंदोलन करती हैं . जबकि बेरमो के जन को यह जरुरत हैं.
हकीकत हैं की लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूती ही आवाम की ताकत को भी बढाती और दर्शाती हैं.बिना विपक्ष लोकशाही के लिए खतरनाक और खराब हैं.
यहां सवाल और जवाब भी यहीं हैं कि अनूप सिंह नें अपनी सियासी महराथ तो साबित किया हैं, लेकिन उनके लिए आज और कल भी खतरा बेरमो की राजनीति में भाजपा ही रहेगी.जिसमे कहीं भी शक नहीं दिखता हैं. बस अब बारी और तैयारी बीजेपी को करनी हैं, कि कैसे कांग्रेस और अनूप सिंह को चुनौती और टक्कर दे.
दूसरी तरफ सियासत की सच्चाई यहीं हैं कि यह सबकुछ अपने हिसाब से चलती हैं. यहां अंतिम सत्य कुछ नहीं होता.

