माँ की गाली और वो आँखों से गिरते आंसू…

माँ की गाली और वो आँखों से गिरते आंसू…

DESK: गाली -गलौज और गलीच भाषा के इस्तेमाल की कभी भी तरफदारी नहीं की जा सकती.इस बेशर्मी को कोई भी अच्छा नहीं कह सकता, बावजूद इसका वजूद विराजमान है. चाहे बेबात या छोटे -मोटे झगड़े की ही क्यों न हो. आप देखे तो कही -कही तो बोलचाल में भी गाली से ही बात का चलन देखने को मिलता हैं . दरअसल, ये जुबान पर ऐसा पैबंद की तरह किसी के मुंह पर चिपका रहता है कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हो. गालियां माँ -बहन और बेटियों के नाम पर सबसे ज्यादा दी जाती है. लाजमी है कि यह शर्मनाक और बेहयापन है.जिसकी कितनी भी निंदा की जाय कम है.खासकर माँ को लगाकर दी गई गाली तो बहुत खराब और बर्दाश्त से बाहर की बात है, क्योंकि माँ की मर्यादा न रखना और अपमान करना तो निचले दर्जे की निहायत ही शर्मनाक वाकियात है.

यहां चर्चा माँ के नाम पर लगाकर दी गई गाली पर ही हो रही है. जिसने बिहार के आने वाले चुनाव में एक बवंडर और तूफान लेकर आया है. सियासत इसे लेकर कुछ ज्यादा ही गर्म है. इसकी तपिश से जो गर्माहट पैदा हुई और फैल रही है. लगता नहीं चुनाव के दरमियान ठंडी होगी.

दरअसल,दरभंगा में कांग्रेस और राजद के लिए लगे मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माँ को गाली दी गई. इसके बाद से ही बवाल, उबाल और सवाल का दौर चल रहा है.
यह माँ की गाली कांग्रेस, राजद समेत तमाम विपक्षी गठबंधन के लिए गले की हड्डी की तरह फंस गई है. हालांकि, तेजस्वी से लेकर तमाम नेता इसे सही नहीं ठहरा रहे. लेकिन, दूसरा पहलू ये भी है कि सियासत में पीछे न रह जाए इसलिए पिछले गड़े मुर्दे उठाकर भाजपा पर ही तोहमत चस्पा कर रहे हैं. उन ठिकरों और बातों को याद दिला रहे है कि कैसे सोनिया गाँधी को जर्सी गाय और कांग्रेस की विधवा बोला गया.सोचिये सियासत भी क्या चिज़ होती हैं. इसके मायने तो यहीं निकलते हैं कि माँ की गाली देना तो गलत हैं. लेकिन आप भी दूध के धूले नहीं हो, आपके दामन पर भी दाग लगा हुआ हैं.पहले उसे साफ कर लीजिये, तब बोलियेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी माँ पर दिए गाली पर भावुक हुए और उनके आँखों से भी आंसू टपक गए.उनका कहना था माँ का स्थान देवी -देवताओं से भी ऊपर माना जाता हैं. इसी बिहार का ही संस्कार हैं कि “माई के स्थान देवता -पितर से भी ऊपर हो ला “
उन्होंने कहा कि राजद -कांग्रेस के मंच से जो गलियां दी गई, वह पूरे देश की माताओं, बहनों और बेटियों का अपमान हैं.
चुनाव में एक सच्चाई हैं की अगर किसी मसले-मुद्दे की हवा और बयार बन गई और जनता ने इसे आन पर लेकर दिल से लगा लिया तो फिर सारा चुनावी परिदृश्य ही बदल देती हैं. खैर बिहार विधानसभा चुनाव की तो अभी शुरुआत है, अभी भी पूरी पिक्चर बाकी हैं. बस इसे देखते रहिए.

NEWSANP के लिए शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट

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