
रांची (RANCHI): सियासत वक़्त के साथ खुद ब खुद करवटे लेते रहती हैं. यही इसका मिजाज और तासीर कहिए. यह न किसी से बंधकर और न ही किसी के शिकंजे में रहती हैं. यह अपना रास्ता खुद बनाती और तय करती है.
झारखण्ड में विधानसभा चुनाव भी दहलीज पर है, सियासी पार्टियां भी तमाम तरह की तैयारियों में जुटी हुई है और इसकी सरगर्मियां भी तेज़ होकर तपिश पैदा कर रही है.
इसबार भी सीधा मुकाबला एनडीए और इंडिया में है. भाजपा और जेएमएम आमने -सामने हैं. इससे इतर कुछ फेरबदल और साइड इफ़ेक्ट भी देखने को मिल रही है.
जेडीयू ने इसबार एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का मन बनाया हैं और सबसे बड़ी खबर ये हैं कि तमाम कयासों, अटकलो को विराम लगाकर झारखण्ड की राजनीति के चाणक्य और एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय जेडीयू में शामिल हो गए हैं . ये मिलाप जेडीयू और सरयू राय दोनों के लिए एक साजगार और मौक़े की तरह है.मौज़ूदा वक़्त में झारखण्ड की जमीन पर जेडीयू का कोई वज़ूद नहीं है. उसे इस बंजर जमीन को इस चुनाव में उपजाऊ बनाना है. जबकि, हकीकत दो दशक पहले देखें तो इसी जेडीयू की ताकत कभी झारखण्ड बनने के बाद चरम पर थी. छह -छह विधायक और मंत्री भी हुआ करते थे. एक पूरा लाव -लश्कर था. लेकिन, समय का ऐसा पहिया घूमा की आहिस्ते -आहिस्ते कमजोर हो गई और आज एक भी विधायक तक नहीं है. मतलब पार्टी का सूपड़ा साफ है और सुन्न बटा – सन्नाटा है .
पिछले 2019 विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने खिरू महतो की अगुवाई में 40 उम्मीदवार उतारे थे. लेकिन, इतनी बुरी गत हुई की एक सीट भी जीत नहीं पाई थी. लेकिन, इसबार की सुगबुगाट से लगता है झारखण्ड में शायद जेडीयू के दिन बदलने वाले हैं .
इसमे कोई शक नहीं हैं कि सरयू राय के आने से जेडीयू को एक ताकत और जान आ गई है.कही न कही पार्टी का खाता खुलने की संभावना भी बढ़ गई है . सरयू राय झारखण्ड की सियासत में एक नामचीन चेहरा और अपनी बेबाक बातों के लिए जाने जाते हैं, पशुपालन घोटाला से लेकर कई बड़े घोटालों को भी उन्होंने उजागर किया. लिहाजा, उनकी इस बेखौफ छवि से भी सियासतदान बड़ी सोच -समझकर ही उनके खिलाफ बोलते या तोहमते लगाते हैं. उनकी अपनी एक अलग जगह और कद झारखण्ड की राजनीति में है.
पिछले चुनाव में उन्होंने जमशेदपुर पश्चिम से बीजेपी से टिकट नहीं मिलने पर पार्टी से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने जमशेदपुर पूर्वी से निर्दलीय तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ ताल ठोक दिया. इतना ही नहीं कड़क मुख्यमंत्री माने जाने वाले रघुवर दास को करारी शिकास्त दे डाली. सरयू राय के इस अंदाज में हासिल हुई जीत काफ़ी सुर्खिया बटोरी थी. रघुवर दास के सियासी करियर का तो ये सबसे बड़ा झटका था. जिसका दर्द आज भी उनके दिल में बैठा है.
आज भी सरयू राय की एक अलग राजनीतिक जमीन, कद और पैठ है. अब जेडीयू के साथ आने से उन्हें भी एक बल मिला है.
झारखण्ड में जेडीयू के लिए अभी चुनौतियों का महासमर है. जहां पार्टी को फिर से खोई जमीन हासिल कर रेस में आना एक अग्निपथ की तरह हैं.पार्टी के साथ विडंबना ये भी है कि कोई नामचीन और जनाधार वाला लीडर नहीं है, खिरू महतो के हाथों में कमान तो है, लेकिन, वो उतनी जमीन पार्टी के लिए तैयार नहीं कर सके और न ही झारखण्ड की सियासत में एक बड़ा नाम ही हैं. सरयू राय के आने से इस कमी को पाटा जा सकेगा.
हालांकि, सरयू राय का भाजपा में लोटने का मन बार -बार करता आया है. लेकिन, वक़्त और अड़चनों के चलते कभी राह सुगम नहीं बन पाई. रघुवर दास के साथ पर्दे के पीछे उनकी अदावत कही न कही आज भी चल ही रही है.जेडीयू में सरयू राय के आने से ये होगा की गठबंधन के तहत भाजपा के करीब आ सकेंगे. एक तरह से जेडीयू की कमान उनके ही हाथ में झारखण्ड में होगी. दूसरी बात ये है कि नीतीश कुमार के साथ उनकी पुरानी दोस्ती भी है, लिहाजा उन्हें पार्टी में कोई रोक -टोक करने वाला नहीं है. शायद जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष भी मनोनीत हो जाए. दरअसल, सरयू राय ने एक तीर से दो निशाना साधा हैं, एक तो भाजपा से करीब भी हुए और जेडीयू के एक तरह से सर्वेसर्वा भी झारखण्ड में हैं. लिहाजा, उनकी अहमियत और ओहदा तो बढ़ेगा ही.इससे उन्हें नजरअंदाज करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं होने वाला है.
सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा जेडीयू को एनडीए के साथ सीट शेयरिंग को लेकर हो सकती है, ऐसा सूत्रों के मुताबिक खबर हैं कि भाजपा 67, आजसू 8 और जेडीयू 5 सीट पर चुनाव लड़ेगी. हालांकि, ये कितना सच साबित होता हैं. ये तो ऐलान के बाद ही पता चलेगा.
जेडीयू के फलक में आने से कही न कही सीट बटवारे में खटपट और तालमेल का आभाव भी हो सकता हैं. क्योंकि आजसू 8 सीट पर मान जाएगी ऐसी संभावना कम ही दिखाई पड़ती हैं. इस सूरत में बड़े भाई की भूमिका में काबिज भाजपा क्या समाधान निकलती हैं. ये देखना दिलचस्प होगा.
भाजपा को पिछला चुनाव भी याद हैं की आजसू के साथ गठबंधन नहीं होने के चलते उसे कितना बड़ा खामियाजा भुगतान पड़ा था.बेशक सरयू राय आ गए हैं, लेकिन असल सच्चाई ये भी है कि जेडीयू का कायाकल्प एनडीए के साथ चुनाव लड़ने में ही होगा. नहीं तो संभावना कम ही है कि कोई अप्रत्याशित सफलता पार्टी को मिलने जा रही है. मतलब यहां साफ यही है कि झारखण्ड में जेडीयू का भविष्य एनडीए के साथ रहने में ही हैं, नहीं तो इस चुनाव में उसे काफ़ी मशक्कत करनी पड़ेगी.
सरयू राय जेडीयू के लिए एक बड़ा चेहरा विधानसभा चुनाव में होंगे. लेकिन उनके लिए भी चुनौती यही होगी कि कैसे झारखण्ड में पार्टी को मजबूत करें और चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीट लाकर किंगमेकर की भूमिका में हो, जिस तरह उनके पार्टी के आलाकमान नीतीश कुमार केंद्र में किंग मेकर के किरदार में अभी अदा कर रहें हैं.
NEWS ANP के लिए रांची से शिवपूजन सिंह की रिपोर्ट