सवर्ण राजनीति, सत्ता-संघर्ष और बिहार में सामाजिक टूटन : इतिहास, तथ्य, परंपरा और भविष्य की संभावित चेतावनी ….

सवर्ण राजनीति, सत्ता-संघर्ष और बिहार में सामाजिक टूटन : इतिहास, तथ्य, परंपरा और भविष्य की संभावित चेतावनी ….

DESK:बिहार की राजनीति का इतिहास जितना पुराना है। उतना ही जातीय संघर्ष, सत्ता-समीकरण और वर्चस्व की लड़ाइयों से भी भरा पड़ा है। 1990 के दशक से लेकर 2010 तक का दौर विशेष रूप से प्रशासनिक उथल-पुथल, सवर्ण नेतृत्व के बिखराव और राजनीतिक षड्यंत्रों की घटनाओं से अटा पटा रहा । समाचार पत्र पत्रिकाओं व टीवी में प्रकाशित और प्रसारित तथ्यों का टाइम फ्रेम बताता हैं कि उसी कालखंड में कई ऐसी घटनाएँ हुईं। जिन्होंने बिहार के ‘उच्च वर्गीय राजनीतिक नेतृत्व’ को एक झटके में कमजोर कर दिया।

जैसा कि रामचरितमानस का यह महामंत्र “परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई”, बिहार का यह दौर इसी पीड़ा के रूप का साक्ष्य बन गया—जहाँ जाति, प्रदेश और वर्चस्व की लड़ाइयों ने स्वर्ण समाज को भीतर तक तोड़ दिया।

1994–2010 IAS मर्डर केस, जो सवर्ण नेतृत्व के विघटन का कालखंड बन गया

गोपालगंज तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का गृह जिला है । जहां के कलक्टर यानि जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) जी कृष्णैया (8 फरवरी 1957 – 5 दिसंबर 1994) थे। ये 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी थे। जिन्हें बिहार के मुजफ्फरपुर में राजनेताओं के नेतृत्व वाली भीड़ में हत्या हो गई थी। 1994 में मृत्यु के समय वे 37 वर्ष के थे।

1994 में हुए IAS अधिकारी जी. कृष्णैया हत्याकांड के तुरंत बाद ही बिहार के सवर्ण नेतृत्व का सबसे बड़ा स्तंभ आनंद मोहन सिंह जेल चले गए। यह वही समय था। जब राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ समुदायों का राजनीतिक नेतृत्व अलग-अलग दिशाओं में अपनी खिचड़ी पकाने लगा।

इसी दौरान —

  • प्रभुनाथ सिंह जेल चले गए।
  • दिग्विजय सिंह—बिहार की यथार्थवादी राजनीति के शिल्पी—की रहस्यमय मृत्यु ने नेतृत्व की बची खुची तीसरी कड़ी भी तोड़ दी।
  • बिहार पीपुल्स पार्टी का समता पार्टी में विलय हुआ। इसके बाद ही लालू यादव की गगनचुंबी राजनीतिक कद में भू-स्खलन का श्रीगणेश हुआ

वेद की मानें तो —
संघे शक्तिः कलियुगे”
अर्थात एकजुटता ही शक्ति है। जब एकता टूटती है। तो शक्ति भी छिन्न-भिन्न हो जाती है।
बिहार के सवर्ण समाज में यही हुआ—नेतृत्व एक-एक कर गिरता गया और समाज अपने भीतर बंटता गया।

छोटन शुक्ला केस: पुलिस वर्दी में आए गुंडे और भूमिहार वर्चस्व की लड़ाई (1994)

इसी दौर में छोटन शुक्ला की हत्या ने बिहार की राजनीति में तूफान ला दिया। आज उन्हीं छोटन शुक्ला की लर्नेड लाडो पिता के विरोधियों के खेमे में है।
वे अपराधी थे—यह दिगर बात है। लेकिन वे मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाकों में भूमिहार वर्चस्व के प्रतीक थे।

इतिहास की प्रकाशित रिपोर्टों की मानें तो—

  • दिनदहाड़े पुलिस वर्दी पहने हमलावरों ने उन्हें गोलियों से भून दिया।
  • यह सिर्फ एक अपराधी की हत्या नहीं थी। यह उस सामाजिक शक्ति पर प्रहार था। जिसे छोटन शुक्ला रिप्रेज़ेंट करते थे। जो इस पंक्ति को दर्शाता है कि जिनके घर शीशे के हों, वे पत्थर नहीं फेंकते।”
    परंतु उस समय हर तरफ से पत्थर ही चल रहे थे—राजनीति में भी और समाज में भी।

भूमिहारों का बड़ा नरसंहार: सेनारी, बारा और मगध का रक्तरंजित इतिहास (1997–1999)

(1997–1999) के मध्य प्रकाशित रिपोर्ट बताता हैं कि मगध क्षेत्र में—

  • सेनारी नरसंहार
  • बारा हत्याकांड

जैसी घटनाओं में भूमिहार समुदाय को खुलकर निशाना बनाया गया।
इन घटनाओं ने सामाजिक ज़ख्मों को गहरा किया । क्षेत्रीय नफ़रत का बीज बो दिया।

लोग कहते हैं कि इसके उत्तर में रणवीर सेना खड़ी हुई, पर वह संघर्ष मगध तक सीमित था।

परंतु सवाल वहीं खड़ा है—अंग, मिथिला, सीमांचल और पश्चिमोत्तर बिहार में सवर्ण एकता कहाँ थी?
क्यों वहाँ कोई संगठित जवाब नहीं उभरा?

वेद का विचार है—
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति”—
सत्य एक होता है, पर उसके रूप अनेक।
इसी प्रकार एकता का संदेश एक था। पर उसका पालन हर क्षेत्र में अलग-अलग ढंग से हुआ—और कुछ जगहों पर बिल्कुल नहीं हुआ।

आनंद मोहन को 16 साल की सजा क्यों हुई? बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र

1994 की घटना के बाद आनंद मोहन को सजा होने में स्पीडी ट्रायल का सहारा लिया गया। वह कई विश्लेषकों के अनुसार एक राजनीतिक मंचन जैसा था।
सवाल उठता रहा कि—

  • जब पूरे बिहार में जातिगत गृहयुद्ध जैसा माहौल था…
  • जब भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, यादव सभी के बीच संघर्ष उफान पर था…

तभी अकेले आनंद मोहन को इतनी कठोर सजा क्यों?

सवाल यह भी है कि—
क्या जी. कृष्णैया को लालू यादव ने जानबूझकर मौके पर “PLOT” पर भेजा था?
क्योंकि उस समय भीड़ हिंसा एक राजनीतिक औजार बन चुकी थी।

इसी कालखंड में पप्पू यादव और कई अन्य बाहुबलियों पर मामलों की लंबी कतार थी। बावजूद “गतिशील राजनीति” जारी रही।
इससे सवर्ण समाज के भीतर क्षोभ और अविश्वास बढ़ा।

राजपूत समाज की मौजूदा बेचैनी

यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि—

यदि आनंद मोहन सिंह पत्नी और बेटे की छाया से अलग होकर स्वतंत्र रूप से राजनीति करें। तो बिहार में राजपूत समाज एक बड़े उत्तरदायित्व में उतर सकता है।

बिहार का सामाजिक ढांचा ऐसा है कि एक प्रतीक-व्यक्ति पूरे समाज की दिशा बदल देता है।
और आनंद मोहन—आज भी ऐसे ही एक प्रतीक हैं।

इसे इस पंक्ति से समझा जा सकता है—
जब तुला पर धर्म रखा, झुक गया अत्याचार, जो झुकता है सत्य के आगे, वह ही है असली विराट।”
बिहार का सवर्ण समाज भी अब उसी तुला पर खड़ा दिखता है। जहाँ उसे तय करना है कि वह बिखराव चुनेगा या एकता।

एकता की आवश्यकता

समय-समय पर सवर्ण समाज की विभिन्न जातियों ने अपने-अपने नेतृत्व को खड़ा किया। परंतु सामूहिक नेतृत्व गढ़ने में चूक हुई।
यही कारण था कि—

  • नेतृत्व एक-एक कर गिरता गया
  • विरोधी मजबूत होते गए
  • और समाज खुद अपने ही चक्रव्यूह में फँसता गया

NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

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