दिल्ली(DELHI): सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में अहम बहस जारी है। यह मामला अब केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि महिलाओं के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान की व्याख्या से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फैसले में ‘अछूत’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत ‘अस्पृश्यता’ कहना सही नहीं है।
इस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि इस तरह की व्याख्या व्यवहारिक रूप से लागू नहीं होती।
वहीं, पहले दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि उम्र या मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना उनकी गरिमा के खिलाफ है और यह पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देता है।
सॉलिसिटर जनरल मेहता ने यह भी तर्क दिया कि सबरीमाला में प्रतिबंध मासिक धर्म से नहीं, बल्कि एक विशेष आयु वर्ग से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि अन्य अय्यप्पा मंदिरों में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है, इसलिए यह एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा का मामला है।
फिलहाल, इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित कई वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं। यह पीठ विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं की गहराई से जांच कर रही है।
NEWSANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

