शरणार्थी माँ की आँसुओं से पश्चिम बंगाल के सत्ता शिखर तक कैसे पहुँचे शुभेंदु अधिकारी…

शरणार्थी माँ की आँसुओं से पश्चिम बंगाल के सत्ता शिखर तक कैसे पहुँचे शुभेंदु अधिकारी…

जहाँ मन भय से मुक्त हो,
और मस्तक ऊँचा हो…

जामताड़ा(JAMTADA): नोबेल पुरस्कार विजेता कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की यह पंक्ति केवल कविता नहीं। वह बंगाल की आत्मा है। वही बंगाल जिसने विभाजन का दर्द देखा। शरणार्थियों की करुण पुकार सुनी। सांप्रदायिक हिंसा की राख में उम्मीदों को पलते देखा और फिर संघर्ष की उसी मिट्टी से नई राजनीति का उदय भी देखा।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार पश्चिम बंगाल में एक ऐसी सरकार बनी है । जिसे व्यापक रूप से हिंदू समर्थित जनादेश की सरकार माना जा रही है। जिसकी कमान संभाल रहे हैं शुभेंदु अधिकारी।
लेकिन इस राजनीतिक घटना के पीछे केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं। बल्कि एक माँ के विस्थापन, आँसू, संघर्ष और असाधारण धैर्य की ऐसी गाथा छिपी है जो किसी उपन्यास से कम नहीं लगती।

गायत्री अधिकारी : संघर्ष, विश्वास और तपस्या का हस्ताक्षर।

पूर्वी बंगाल की गलियों से शुरू हुई पीड़ा

आज का बांग्लादेश कभी अविभाजित भारत का पूर्वी बंगाल हुआ करता था। वहीं बारीसाल की मिट्टी में एक बच्ची ने जन्म लिया था — गायत्री भट्टाचार्य।
उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह बच्ची आगे चलकर उस राजनीतिक अध्याय की आधारशिला बनेगी। जिसकी चर्चा पूरे भारत सहित विश्व पटल में होगी।

लेकिन इतिहास केवल सपनों से नहीं चलता।
वह कई बार मनुष्यों को ऐसी अग्निपरीक्षाओं से गुजारता है। जिसकी कल्पना भी कठिन होती है।

साल 1960।
पूर्वी पाकिस्तान में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था। हिंदू परिवार भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के साये में जी रहे थे। गायत्री के पिता माखनलाल भट्टाचार्य एक साधारण स्कूल शिक्षक थे। जिनकी सबसे बड़ी पूंजी शिक्षा और संस्कार थे।

पर इतिहास ने उनसे सब छीन लिया। सिर्फ इसलिए क्योंकि वे हिंदू थे।

घर छूटा।
आँगन छूटा।
मिट्टी छूटी।
बचपन की स्मृतियाँ छूट गईं। और एक छोटी बच्ची अपने पिता का हाथ पकड़कर पश्चिम बंगाल की ओर चल पड़ी।

यह दृश्य कहीं न कहीं बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यासों की उस पीड़ा की याद दिलाता है। जहाँ मातृभूमि केवल भूगोल नहीं होती। वह मनुष्य की आत्मा होती है।

शरणार्थी जीवन की पीड़ा और नया संघर्ष

पश्चिम बंगाल पहुँचना अंत नहीं था। तब संघर्ष की नई शुरुआत थी। शरणार्थी जीवन केवल आर्थिक कठिनाई नहीं देता। वह मनुष्य के भीतर असुरक्षा और अपमान का ऐसा घाव छोड़ देता है। जिसे शब्दों में बाँधना कठिन होता है।

कवि जीबनानंद दास ने कभी लिखा था—
“मनुष्य केवल रोटी से नहीं, स्मृतियों से भी जीवित रहता है।”

गायत्री अधिकारी भी शायद उन्हीं स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ती रहीं।

कुछ वर्षों बाद उनकी शादी पूर्व मेदिनीपुर के कांथी क्षेत्र के करकुली गाँव में अधिकारी परिवार में हुई। यह परिवार केवल सामाजिक प्रतिष्ठा वाला नहीं था। स्वतंत्रता संग्राम की तपिश में तपकर निकला हुआ परिवार था।

उनके पति शिशिर अधिकारी जनसेवा और संघर्ष की राजनीति से जुड़े थे।
जबकि परिवार के बुजुर्ग — केनाराम अधिकारी और कादंबिनी अधिकारी — स्वतंत्रता सेनानी रहे। अंग्रेजों ने कई बार उनका घर जलाया। लेकिन उनका राष्ट्रप्रेम नहीं जला सके।

संघर्ष की गोद में जन्मा एक बालक शुभेंदु

फिर आया वर्ष 1970।
करकुली गाँव के एक साधारण घर में गायत्री अधिकारी ने एक पुत्र को जन्म दिया।

वह कोई राजमहल नहीं था।
न कोई सत्ता का वैभव।
न राजनीतिक साम्राज्य।

वह एक शरणार्थी माँ की गोद थी। जिसने दर्द में भी उम्मीद बचाकर रखी थी।

उस बच्चे का नाम रखा गया — शुभेंदु अधिकारी।

यहाँ कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लगती है।
एक माँ जिसने अपना बचपन विस्थापन में खो दिया…
जिसने असुरक्षा को अपनी आँखों से देखा…
जिसने संघर्ष को जीवन की भाषा बना लिया…

आज वही माँ अपने बेटे को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए देखी है।

बंगाल की राजनीति में नया अध्याय

पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वैचारिक आंदोलनों, वामपंथी संघर्षों और सांस्कृतिक विमर्शों के इर्द-गिर्द घूमती रही।
लेकिन समय के साथ बंगाल की सामाजिक संरचना और राजनीतिक प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया।

शुभेंदु अधिकारी का सत्ता तक पहुँचना केवल एक नेता की व्यक्तिगत सफलता नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बंगाल के सामाजिक और सांस्कृतिक मानस में आए परिवर्तन के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है।

यह वही बंगाल है जहाँ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यासों में साधारण मनुष्यों के संघर्ष को अमर बना दिया था।
शरतचंद्र के पात्र अक्सर टूटते नहीं थे। बल्कि परिस्थितियों से लड़ते हुए अपने अस्तित्व को बचाते थे।

गायत्री अधिकारी की कहानी भी कुछ वैसी ही है।

माँ की खामोश तपस्या का प्रतिफल

राजनीति में नेताओं के भाषण दिख जाते हैं। रैलियाँ दिख जाती हैं। विजय जुलूस दिख जाते हैं।
लेकिन उन माताओं का संघर्ष अक्सर इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हो पाता। जिन्होंने अपने बच्चों के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया।

गायत्री अधिकारी की कहानी उसी खामोश तपस्या की कहानी है।

यह केवल सत्ता तक पहुँचने की यात्रा नहीं। उस भारतीय स्त्री की कहानी है जिसने विस्थापन के दर्द को शक्ति में बदल दिया।

बंगाल की मिट्टी में फिर जागी नई आशा

कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंगाल को केवल साहित्य नहीं दिया। यह विश्वास भी दिया कि अंधकार कितना भी गहरा हो। मनुष्य उम्मीद का दीप जलाना नहीं छोड़ता।

आज शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ है।
समर्थक इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण और ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं। जबकि विरोधी इसे नई वैचारिक चुनौती मान रहे हैं।

लेकिन राजनीति से परे यदि इस पूरी कहानी को देखा जाए। तो यह अंततः एक माँ की कहानी बन जाती है—

एक ऐसी माँ, जो कभी पूर्वी बंगाल से खाली हाथ निकली थी…और आज उसी माँ का बेटा पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुँच गया।

क्या सफर रहा।
क्या संघर्ष रहा।
और सचमुच…
क्या कहानी है।

NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

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