मिहिजाम नगर परिषद : क्या हठधर्मिता के बोझ तले दबी है प्रशासनिक जवाबदेही?

मिहिजाम नगर परिषद : क्या हठधर्मिता के बोझ तले दबी है प्रशासनिक जवाबदेही?

जामताड़ा(JAMTADA): नगर परिषद मिहिजाम मौजा-15 में हाट-बाजार बंदोबस्ती, अवैध होल्डिंग टैक्स और PESA Act के कथित उल्लंघन को लेकर उठा विवाद अब एक प्रशासनिक फाइल का विषय नहीं रह गया है। यह मामला धीरे-धीरे स्थानीय शासन व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनशीलता और जवाबदेही के बड़े प्रश्न में बदलता दिखाई दे रहा है। राजस्व ग्राम प्रधान आवेदक मुन्ना मिस्त्री द्वारा प्रधानमंत्री से लेकर राज्यपाल, मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन तक भेजे गए पत्र ने नगर परिषद मिहिजाम की कार्यशैली पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

सबसे अधिक चर्चा नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी गोपेश कुमार के कथित रवैये को लेकर हो रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिस गंभीरता से अनुसूचित क्षेत्र के संवेदनशील मामलों को देखा जाना चाहिए। उस स्तर की प्रशासनिक तत्परता यहां दिखाई नहीं पड़ रही। उल्टा, शिकायतों और जांच की प्रक्रिया को हल्के में लेने जैसी मानसिकता सामने आ रही है।

“सैकड़ों पत्र देता है” — क्या यह लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल है?

जब इस पूरे मामले पर मोबाइल फोन के माध्यम से कार्यपालक पदाधिकारी गोपेश कुमार से जानकारी प्राप्त की गई। तब उन्होंने कथित रूप से कहा कि “मुन्ना मिस्त्री ऐसा सैकड़ों पत्र देता है। इसका कोई असर नहीं होना है।” यह बयान स्थानीय स्तर पर तेजी से चर्चा का विषय बन गया है।

क्योंकि यहां प्रश्न एक शिकायतकर्ता का नहीं। बल्कि उन संवैधानिक प्रावधानों का है जिनके उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। यदि शिकायतें निराधार हैं। तो प्रशासनिक रूप से उसका स्पष्ट प्रतिवेदन सार्वजनिक होना चाहिए। लेकिन यदि उपायुक्त कार्यालय की गोपनीय शाखा स्वयं जांच समिति गठित कर रही है। तो यह मानना कठिन है कि मामला पूरी तरह महत्वहीन है।
(If the complaints are baseless, a clear administrative report should be made public. However, if the confidential branch of the Deputy Commissioner’s office is forming its own inquiry committee, it’s hard to believe the matter is completely insignificant.)

मिहिजाम की जिम्मेदारी, आवासन धनबाद में!

स्थानीय नागरिकों के बीच सबसे बड़ा असंतोष इस बात को लेकर है कि मिहिजाम जैसे तेजी से विस्तारित हो रहे नगर परिषद क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालने वाले कार्यपालक पदाधिकारी का स्थायी आवासन कथित रूप से लगभग 80-90 किलोमीटर दूर धनबाद में है।

लोगों का कहना है कि प्रतिदिन इतनी लंबी दूरी तय करने के कारण प्रशासनिक उपस्थिति प्रभावित होती है। सुबह आने और शाम लौटने की प्रक्रिया में बहुमूल्य सरकारी समय और राजस्व दोनों की क्षति होती है। नगर परिषद का वाहन, ईंधन और अन्य संसाधन नियमित आवाजाही में खर्च होते हैं, जबकि दूसरी ओर आम नागरिक छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए घंटों कार्यालय के चक्कर लगाने को विवश हैं।

नगर परिषद कार्यालय में इंतजार और निराशा

मिहिजाम नगर परिषद कार्यालय नगर के दूसरे छोर पर स्थित है। दूर-दराज मोहल्लों और ग्रामीण सीमा से आने वाले लोग सुबह से अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते हैं। इनमें होल्डिंग टैक्स, जलापूर्ति, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, नाली-सड़क, आवास योजना और सफाई व्यवस्था से जुड़े मुद्दे प्रमुख होते हैं।

लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार कार्यपालक पदाधिकारी समय पर कार्यालय नहीं पहुंचते। परिणामस्वरूप लोग घंटों इंतजार के बाद बिना समाधान के लौटने को मजबूर हो जाते हैं। बुजुर्ग, महिलाएं और मजदूरी करने वाले नागरिकों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है। कई लोगों का कहना है कि एक दिन का काम छोड़कर परिषद कार्यालय आने के बावजूद यदि अधिकारी उपलब्ध न हों, तो यह आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का नुकसान है।

राजस्व का “रामनाम सत्य” होने का आरोप

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर परिषद का मूल उद्देश्य स्थानीय विकास और नागरिक सुविधाओं का विस्तार है। लेकिन यदि सरकारी संसाधनों का बड़ा हिस्सा केवल लंबी दूरी की आवाजाही और प्रशासनिक शिथिलता में खर्च हो जाए, तो विकास योजनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ना स्वाभाविक है।

लोग व्यंग्यात्मक लहजे में कह रहे हैं कि मिहिजाम नगर परिषद का राजस्व विकास कार्यों से अधिक “आने-जाने” में “रामनाम सत्य” हो रहा है। यह टिप्पणी भले ही भावनात्मक प्रतीत हो, लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी निराशा झलक रही है।

“प्रेमचंद का “नमक का दारोगा” फिर क्यों याद आता है?

ऐसे हालात में हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी “नमक का दारोगा” बार-बार स्मरण हो उठती है। प्रेमचंद ने उस कहानी में दिखाया था कि व्यवस्था में बैठे लोग अक्सर ईमानदार प्रश्नों को विद्रोह मान लेते हैं। शिकायत करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे “समस्या उठाने वाला” घोषित कर दिया जाता है, जबकि मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।

मिहिजाम में भी अब चर्चा शिकायतकर्ता से अधिक शिकायतों की गंभीरता पर होनी चाहिए। आखिर यदि PESA Act और SPT Act के उल्लंघन के आरोप लगे हैं, यदि जांच समितियां बनी हैं, यदि उपायुक्त कार्यालय सक्रिय हुआ है, तो सवालों को केवल “सैकड़ों पत्र” कहकर खारिज कर देना क्या उचित प्रशासनिक दृष्टिकोण माना जा सकता है?

अनुसूचित क्षेत्र की संवेदनशीलता को समझना होगा

PESA Act 1996 और SPT Act 1949 केवल कानूनी दस्तावेज नहीं हैं। ये अनुसूचित क्षेत्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता और स्थानीय अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए विशेष प्रावधान हैं। इसलिए इनसे जुड़े मामलों में प्रशासनिक व्यवहार अत्यंत संवेदनशील और पारदर्शी होना चाहिए।

अब निगाहें जिला प्रशासन पर

स्थानीय लोगों की निगाहें अब जामताड़ा जिला प्रशासन पर टिकी हुई हैं। लोग जानना चाहते हैं कि गठित जांच समितियों की रिपोर्ट कब आएगी? क्या जांच प्रतिवेदन सार्वजनिक होगा? क्या नगर परिषद के कार्यों की निष्पक्ष समीक्षा होगी? और सबसे महत्वपूर्ण — क्या प्रशासन जनता के धैर्य और संवैधानिक अधिकारों को गंभीरता से लेगा?

क्योंकि यदि जांच केवल फाइलों तक सीमित रह गई, तो जनता का भरोसा कमजोर होगा। लेकिन यदि निष्पक्ष कार्रवाई हुई, तो यह संदेश जाएगाऋ कि कानून केवल आम लोगों के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों के लिए भी समान रूप से लागू होता है।

NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

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