धनबाद(DHANBAD): 30 दिनों तक जेल में रहनेवाले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों की कुर्सी स्वतः छिन जाने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक का मैं पुरजोर विरोध करता हूं। यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। ‘लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन है।’ यह लोकतंत्र का सर्वमान्य फार्मूला है। जनता चाहे तो डाकू अंगुलीमाल या गब्बर सिंह को अपना प्रतिनिधि चुन ले। जनता को उसी का शासन पसंद है तो आप रोकने -टोकनेवाले कौन है ? और जनता अपने इस अधिकार का उपयोग भी करती है।
एक से एक भ्रष्टाचार शिरोमणि, माफिया सरदार, हत्यारोपी, दुष्कर्म सम्राट और लूट के महारथी जनता द्वारा चुने जाते रहे हैं। जनप्रतिनिधि बनकर वे गंगा नहा लेते हैं। जनता किसे चुने यह उसका विशेषाधिकार है। इस पर किसी तरह का अंकुश लगाना जनता के अधिकारों पर डाका है। मोदी सरकार की सोच उलटी है इसलिए उसने ऐसा विधेयक लाया है। विपक्षी सांसदों ने विधेयक पेश करते समय लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह पर विधेयक की चिंदिया उड़ाकर सराहनीय कार्य किया है। वे सही अर्थों में लोकतंत्र के रक्षक हैं।
जनता ने जब एक बार किसी को अपना प्रतिनिधि चुन लिया तो वे ‘माननीय’ हो गए। और ‘माननीय’ पर कैसा अंकुश ? वे तो संप्रभु हो गए ! फिर संप्रभु पर कैसी बंदिश ! होना तो यह चाहिए जो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री या जनप्रतिनिधि चुन लिए गए उन्हें कानून से परे घोषित कर दिया चाहिए। यानी उन पर कोई केस दायर नहीं हो सकता। जब कोई कोई माननीय बन गया तो वो कानून बनानेवाला हो गया। उसी का बनाया कानून उसी पर कैसे लागू होगा ?
इंग्लैण्ड में, जिसकी नक़ल हमारा लोकतंत्र है, वहां माना जाता है कि राजा कभी गलती नहीं कर सकता। उसी तर्ज पर हमें भी क़ानूनी रूप से यह घोषित करना चाहिए कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री गण कोई गलती नहीं कर सकते। और गलती नहीं कर सकते तो उन पर मुक़दमा कैसे चलेगा ? केस ही दर्ज नहीं होगा! इससे हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा। अभी भी समय है। केंद्र सरकार इस संविधान संशोधन बिल को वापस ले अन्यथा लोकतंत्र कमजोर करने का पाप उसपर लगेगा !
इसके पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने निचली अदालत द्वारा सजा दिए जाने पर सांसदी/ विधायिकी छिन जाने सम्बन्धी सुप्रीम कोर्ट के आदेश से माननीयों को बचाने के लिए पहल की थी। तब राहुल गांधी अड़ गए थे और उसे बकवास करार देकर सरकार के फैसले को फाड़ कर फेंक दिया था। तब राहुल अबोध थे। अति उत्साह में थे। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मानने को तैयार नहीं थे। इसलिए सजायाफ्ता को बचाने का विरोध कर रहे थे। अब वे सयाने हो गए हैं। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में स्वीकार कर लिया है, इसलिए कुर्सी छीने जाने का विरोध कर रहे हैं। वे अब व्यावहारिक हो गए हैं।
नेशनल हेराल्ड केस में जमानत बाद उनके ज्ञान चक्षु खुल गए हैं। राहुल जी से भाजपावालों को सीखना चाहिए। राष्ट्र की मुख्यधारा भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मानने की है। भाजपा खुद को राष्ट्रवादी पार्टी कहती है। अगर वह सचमुच राष्ट्रवादी है तो उसे राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ चलना चाहिए। इसी में सबका साथ और सबका विकास है।
NEWS ANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट

