शिवपूजन सिंह/ वरिष्ठ पत्रकार
बेरमो (BERMO): नगर परिषद चुनाव में जीत का एक बेहतरीन मौका भाजपा ने गवा दिया. इसबार पार्टी के पास अवसर और समीकरण दोनों साथ -साथ थे. लेकिन इसके बावजूद बीजेपी हाथ मलते रह गईं. बिस्कुट छाप पर उतरी ममता देवी मेयर बनते -बनते रह गईं. अगर थोड़ा जोर लगाया होता तो नतीजा पक्ष में आ सकता था , लेकिन प्रचार की कमी, रणनीति का आभाव और शीर्ष सियासतदानों का लापरवाही और लाचारी साफ -साफ दिखलाई पड़ी.
इन खामियों का असर ही था कि जेएमएम के चुनावी समर में उतरने के बावजूद कांग्रेस के समर्थन में उतरी छड़ी छाप से खड़ी निर्मला देवी जीत गईं. कांग्रेस विधायक जयमंगल सिंह ने तो इस चुनाव को आन, मान और सम्मान का विषय बना लिया था. अपनी सभा में तो घुटने टेक कर वोट देने की गुजारिश बेरमो के आवाम से की थी . इसका असर और फायदा यह हुआ कि उनके कट्टर और खाटी वोटर्स हटे नहीं. खासकर मुस्लिम मतदाताओं ने वोट देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी .यहां मुस्लिम वोट का बिखराव नहीं हुआ, ऐसे आसार लगाए ज रहें थे की जेएमएम समर्थित वीणा कुमारी को भी वोट पड़ेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
भाजपा को उम्मीद थी कि वीणा कुमारी और निर्मला देवी के वोट बंटवारे का फायदा ममता देवी को मिलेगा. लेकिन यह अनुमान और आकलन ही अंत तक गलत साबित हो गया.उल्टे वीणा कुमारी ने अपनी सबसे पढ़ी -लिखी और सुयोग्य उम्मीदवार की छवि पेश करके भाजपा के ही वोट कुछ काट ली.
निर्मला देवी की जीत के पीछे सबसे बड़ी वजह कांग्रेस के कोर वोटर्स के वोट का बिखराव नहीं हुआ, विधायक जयमंगल सिंह की अगुवाई पर ही अटूट भरोसा किया और वोट डाला.
सवाल जो उठ रहें हैं कि आखिर क्या कमी और कमजोरी रही की जीत की दहलीज पर खड़ी दिख रही भाजपा पराजय का दंश झेल गईं?.
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह नेतृत्व का घोर आभाव दिखता हैं, दरअसल, बेरमो भाजपा में ऐसा कोई सर्वमान्य नेता और चेहरा नजर नहीं आता और दिखता हैं, जो जोश -खरोश जगा सके.
चुनाव प्रचार के दौरान भी भाजपा की सभा उतनी तो नहीं दिखी और न ही झारखण्ड भाजपा का शीर्ष नेता ही यहां चुनावी समर में कैंपन करने और कैंप करने ही आए.
बेरमो भाजपा के साथ दिक्कत ये हैं कि यह आपस में उलझी, बिखरी और खुन्नस खाये नजर आती हैं. सच कहां जाय तो यहां कोई चेहरा ही नहीं दिखता. गिरिडीह लोकसभा से रिकॉर्ड पांच बार सांसद रहें और इसबार बेरमो विधानसभा में प्रत्याशी रहें रविंद्र पाण्डेय एक बड़ा चेहरा बन सकते हैं. लेकिन क्यों उदासीन और जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते यह सवाल बार -बार खटकता हैं.
बेरमो भाजपा के लिए सबसे अच्छी बात ये हैं कि हर वार्ड में इसके अच्छे खासे वोटर्स की तादाद हैं. सच कहा जाए तो इसके कैडर्स हैं, जो भाजपा की विचारधारा के तहत वोट करते हैं. बेशक प्रत्याशी कोई भी खड़ा हो.
सबसे चौकाने वाली बात ये है कि कई वार्डो में कांग्रेस का गढ होने के बावजूद वहां भाजपा के वोटर्स टक्कर देते हैं और चुपचाप वोट करते हैं . वार्ड नम्बर 1 से 9 कांग्रेस के गढ वाला इलाका हैं बावजूद इसके भाजपा के वोटर्स यहां कम दिखलाई नहीं पड़ते. बल्कि कांग्रेस से भाजपा के वोटर्स की संख्या कुछ ही कम नजर आई.
प्रश्न उठता हैं कि भाजपा को क्या करना चाहिए? ताकि बेरमो में कांग्रेस के किले में सेंध लगाई जाए?. इसका हल सबसे पहले तो यहीं हैं कि आपसी कलह और बिखराव को खत्म करने की सख्त जरुरत हैं. इसके साथ ही संगठन की मजबूती और वोटर्स से संवाद स्थापित करने पर जोर लगाना होगा. हालांकि . यह सबकुछ बेरमो भाजपा के आला नेताओं पर ही निर्भर करता हैं. अगर यह चुस्त -दुरुस्त होकर एक हो जाए तो फिर उसके लिए कुछ भी मुश्किल नहीं, क्योंकि उनके मतदाताओं की भी यहीं चाहत हैं. अगर थोड़ा ध्यान दे दिया गया तो फिर बेरमो में कांग्रेस से टककर लेना और पलटवार करना भी उतना मुश्किल नहीं होगा.लेकिन यह तब संभव है जब बेरमो भाजपा एकजुट होगी और कदम उठाएगी.

