धनवंतरी के सिद्धांतों से झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्न
जामताड़ा(JAMTADA): हाल में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भारतीय जनता पार्टी के झारखंड हैंडल द्वारा एक गंभीर मुद्दा उठाया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि अस्पतालों में पानी की कमी के कारण ऑपरेशन तक टल रहे हैं। इस पोस्ट के माध्यम से राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकार की कार्यशैली पर तीखा सवाल उठा है।
भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को केवल शरीर की चिकित्सा नहीं। जीवन रक्षा का सर्वोच्च धर्म माना गया है। हमारे शास्त्रों में भगवान धनवंतरी को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता कहा गया। समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए धनवंतरी का संदेश स्पष्ट था— “जहां स्वास्थ्य सुरक्षित है, वहीं समाज और राज्य सुरक्षित है।”
आज जब झारखंड के कई सरकारी अस्पतालों से यह चर्चा सामने आती है कि पानी की कमी के कारण ऑपरेशन प्रभावित हो रहे हैं, मरीजों को इलाज के लिए इंतजार करना पड़ रहा है और अस्पतालों की मूलभूत व्यवस्था चरमरा रही है, तब यह केवल प्रशासनिक असफलता का विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह मानव जीवन की गरिमा से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
यह प्रश्न इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि राज्य में सत्ता संभाल रही झारखंड मुक्ति मोर्चा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल की गठबंधन सरकार स्वयं को जनहितैषी और संवेदनशील शासन बताती रही है। ऐसे में यदि अस्पतालों में पानी जैसी बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में सवाल उठना तय है।
स्वास्थ्य केवल विभाग नहीं, सभ्यता का आधार
किसी भी राज्य की प्रगति केवल सड़क, पुल और भवनों से नहीं मापी जाती। वास्तविक विकास उस समय दिखाई देता है जब गरीब व्यक्ति बिना भय के सरकारी अस्पताल में इलाज करा सके।
स्वास्थ्य विभाग किसी भी सरकार की रीढ़ होता है।
यदि शिक्षा समाज का भविष्य बनाती है, तो स्वास्थ्य विभाग वर्तमान को बचाता है।
एक बीमार समाज न तो आर्थिक रूप से मजबूत बन सकता है और न ही सामाजिक रूप से स्थिर रह सकता है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे पहली जिम्मेदारी होती है कि वह अस्पतालों में—
स्वच्छ पानी,
बिजली,
दवाइयां,
डॉक्टर,
नर्सिंग स्टाफ,
ऑपरेशन थिएटर,
एम्बुलेंस और
आपातकालीन सेवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करे।
लेकिन जब ऑपरेशन थिएटर पानी के अभाव में प्रभावित होने लगें, तब यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं रहती; यह प्रशासनिक चेतना की परीक्षा बन जाती है।
धनवंतरी का सिद्धांत क्या कहता है?
भारतीय चिकित्सा परंपरा में धनवंतरी का सिद्धांत केवल औषधि तक सीमित नहीं था। आयुर्वेद में “जल” को जीवन का आधार माना गया है। शुद्ध जल, स्वच्छ वातावरण और संतुलित व्यवस्था को उपचार की पहली शर्त कहा गया।
यदि अस्पताल में पानी ही उपलब्ध नहीं होगा, तो—
संक्रमण कैसे रुकेगा?
ऑपरेशन थिएटर की सफाई कैसे होगी?
उपकरणों का सैनिटाइजेशन कैसे होगा?
मरीजों की देखभाल कैसे होगी?
यह स्थिति सीधे-सीधे चिकित्सा व्यवस्था की जड़ों पर प्रश्न खड़ा करती है।
धनवंतरी का दर्शन कहता है कि चिकित्सा सेवा करुणा, स्वच्छता और तत्परता का संगम होनी चाहिए। लेकिन जब मरीज ऑपरेशन की तारीख मिलने के बाद भी केवल पानी के अभाव में प्रतीक्षा करने को मजबूर हो जाए, तब यह व्यवस्था करुणा से अधिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाती है।
झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था : दावों और धरातल का अंतर
झारखंड एक संसाधन संपन्न राज्य है। यहां खनिज हैं, उद्योग हैं, राजस्व है और योजनाओं की कोई कमी नहीं है। फिर भी यदि ग्रामीण अस्पतालों और जिला अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं, तो समस्या संसाधनों की नहीं बल्कि प्राथमिकताओं की प्रतीत होती है।
सरकारें अक्सर स्वास्थ्य क्षेत्र में नई योजनाओं, बीमा योजनाओं और भवन निर्माण की घोषणाएं करती हैं। लेकिन जनता का वास्तविक अनुभव अस्पताल के भीतर तय होता है।
यदि—
मरीज को स्ट्रेचर नहीं मिलता,
डॉक्टर समय पर उपलब्ध नहीं होते,
दवाइयां बाहर से खरीदनी पड़ती हैं,
जांच मशीनें खराब रहती हैं,
और अब पानी के कारण ऑपरेशन प्रभावित होने लगें,
तो फिर जनता के मन में अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है।
आज झारखंड के दूरदराज क्षेत्रों में गरीब परिवार सरकारी अस्पताल को अंतिम उम्मीद मानते हैं। उनके पास निजी अस्पतालों के महंगे इलाज का विकल्प नहीं होता। ऐसे में सरकारी व्यवस्था की हर कमजोरी सीधे गरीब की जिंदगी पर चोट करती है।
मौलिक सुधार की आवश्यकता
यह समय केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन का है। स्वास्थ्य व्यवस्था में मौलिक सुधार के बिना स्थिति नहीं बदलेगी।
- अस्पतालों में आधारभूत संरचना की गारंटी
हर सरकारी अस्पताल में 24 घंटे पानी और बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए।
ऑपरेशन थिएटर और ICU जैसी सेवाओं के लिए अलग जल भंडारण प्रणाली विकसित करनी होगी।
- जवाबदेही आधारित प्रशासन
यदि किसी अस्पताल में मूलभूत सुविधा के अभाव में ऑपरेशन प्रभावित होता है, तो इसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
जवाबदेही के बिना सुधार केवल कागजों में सीमित रह जाते हैं।
- ग्रामीण स्वास्थ्य मॉडल को मजबूत करना
झारखंड का बड़ा हिस्सा ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में फैला हुआ है। वहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ना आवश्यक है।
हर जिला अस्पताल पर बोझ डालने से व्यवस्था टूटती है।
- डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा व सम्मान
स्वास्थ्य व्यवस्था केवल भवनों से नहीं चलती; इसे डॉक्टर, नर्स और कर्मचारी जीवित रखते हैं।
उनकी संख्या, प्रशिक्षण और कार्य परिस्थितियों पर विशेष ध्यान देना होगा।
- तकनीक और निगरानी प्रणाली
राज्य स्तर पर एक डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम होना चाहिए जिससे अस्पतालों की दैनिक स्थिति— पानी, बिजली, दवा और उपकरणों की उपलब्धता— पर लगातार नजर रखी जा सके।
राजनीति से ऊपर मानव जीवन
लोकतंत्र में विपक्ष सरकार से प्रश्न पूछता है और सरकार जवाब देती है। यह स्वस्थ परंपरा है। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट राजनीति से ऊपर का विषय है।
एक गरीब मां जब अपने बच्चे के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचती है, तब उसे सरकार की विचारधारा नहीं, बल्कि उपचार चाहिए।
एक वृद्ध व्यक्ति को भाषण नहीं, दवा चाहिए।
एक घायल मरीज को घोषणा नहीं, तत्काल उपचार चाहिए।
यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग को हमेशा संवेदनशील प्रशासन का दर्पण माना गया है। जिस राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होती है, वहां जनता का सरकार पर भरोसा भी मजबूत होता है।
जनता सब देख रही है
आज सूचना का युग है। सोशल मीडिया पर उठ रहे सवाल, अस्पतालों की बदहाली, मरीजों की पीड़ा और प्रशासनिक लापरवाही अब छिप नहीं सकती। जनता यह भी देख रही है कि कौन केवल बयान दे रहा है और कौन व्यवस्था सुधारने के लिए गंभीर प्रयास कर रहा है।
यदि अस्पतालों में पानी जैसी मूलभूत समस्या बनी रहती है, तो यह केवल स्वास्थ्य संकट नहीं रहेगा; यह शासन की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाएगा।
धनवंतरी की परंपरा हमें यह सिखाती है कि चिकित्सा सेवा सबसे बड़ा लोकधर्म है। जिस दिन शासन इस सिद्धांत को ईमानदारी से आत्मसात कर लेगा, उसी दिन अस्पतालों में मरीज भय नहीं, विश्वास लेकर प्रवेश करेंगे।
NEWSANP के लिए आर पी सिंह की रिपोर्ट

