23 सितंबर को होगा जिर्णोद्धार का उद्घाटन, ख़ून दान कर जवान मनाएंगे जश्न।
जामताड़ा(JAMTADA):ऊंट के मुंह में जीरा” की तरह टुकड़ों-टुकड़ों में मिलने वाली मदद और ढाक के तीन पात” जैसे बरसों तक ठहरे हालात ने झिलुआ स्थित आईआरबी कैंप-1 को 17 साल तक जर्जर हालात में ही रखा। यह वर्ष 2008 में चक्रवाती तुफान में चरमराया गया ।उसके बाद जिम्मेदारों ने आगे कुआँ, पीछे खाई” की हालत में जवानों को बेसहारा छोड़ दिया।
अब तस्वीर बदल रही है। जामताड़ा के वर्तमान पुलिस अधीक्षक सह समादेष्टा राजकुमार मेहता ने कैंप के जिर्णोद्धार का जिम्मा संभाला । लोहे को लोहा काटता है” की तर्ज पर युवा अधिकारी ने जड़ता पर प्रहार करना शुरू किया। जीर्णोद्धार का सिलसिला शुरू हुआ। उनके प्रयासों से अब कैंप की पुरानी छवि अतीत बन गया है।
17 साल बाद बदला स्वरूप
आईआरबी कैंप-1 की स्थापना 2005 में हुई । 2008 में इसका शुभारंभ हुआ। लेकिन उसी वर्ष आए आंधी और बारिश में ग्राउंड एवं वाहनों का एमटी शेड उड़ गया। उसके बाद वर्षों तक जवानों ने टूटी छत, जीर्ण-शीर्ण बैरेक और असुविधाओं के बीच अपनी ड्यूटी निभाई। कई समादेष्टा आए और चले गए, परंतु सुधार की दिशा में पहल कभी नहीं हुआ।
एसपी राजकुमार मेहता ने जिम्मेदारी लेते ही कैंप का निरीक्षण किया। जवानों और अधिकारियों से बातचीत कर उन्होंने समस्याओं की तह तक जाना और फिर नौ दिन चले अढ़ाई कोस” वाली सुस्ती को तोड़कर तेज़ रफ्तार से कार्य शुरू कराया।
किए गए प्रमुख बदलाव
- जर्जर मेस को नए रूप में तैयार किया गया।
- महिला बैरेक, परेड ग्राउंड शेड, प्रवेश द्वार और मंदिर शेड का कायाकल्प किया गया।
- एमटी शेड को फिर से खड़ा किया ।
- कैंप परिसर को व्यवस्थित कर जवानों की दैनिक जरूरतों के अनुरूप बनाया गया।
- जल्द ही सोलर पावर यूनिट भी शुरू होगी।
फंडिंग और प्रबंधन
राजकुमार मेहता ने जीर्णोद्धार कार्य के लिए रक्षा वाहिनी फंड, डीएमएफटी फंड और विधायक निधि का उपयोग सुनिश्चित किया। उनकी पहल से विभिन्न स्रोतों से राशि उपलब्ध कराई गई और कार्य समय पर पूरा हुआ।
23 सितंबर को उद्घाटन और रक्तदान शिविर
नए स्वरूप में दिख रहे इस कैंप का उद्घाटन 23 सितंबर को किया जाएगा। मौके पर रक्तदान शिविर का भी आयोजन होगा। इससे कैंप का वातावरण केवल भौतिक रूप से ही नहीं। बल्कि सामाजिक योगदान के दृष्टिकोण से भी सशक्त होगा।
लापरवाही बनाम तत्परता
पिछले 17 वर्षों की अनदेखी यह दर्शाती है कि नौ दिन चले अढ़ाई कोस” जैसी सुस्ती कैसे जवानों के मनोबल पर भारी पड़ी। वहीं एसपी राजकुमार मेहता की तत्परता यह साबित करती है कि जहाँ चाह वहाँ राह” कोई खोखली कहावत नहीं है। उनकी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से कैंप आज नई पहचान पा रहा है।
NEWSANP के लिए जामताड़ा से आर पी सिंह की रिपोर्ट

