आयुष महिला डॉक्टर की जबरन बुर्का (हिजाब)हटाने के मामले में एक बार फिर नीतीश के सेहत को लेकर उठा सवाल…उधर मुस्लिम महिला डॉक्टर ने अब नियुक्ति लेने से किया इंकार..विमर्श जारी..

आयुष महिला डॉक्टर की जबरन बुर्का (हिजाब)हटाने के मामले में एक बार फिर नीतीश के सेहत को लेकर उठा सवाल…उधर मुस्लिम महिला डॉक्टर ने अब नियुक्ति लेने से किया इंकार..विमर्श जारी..

(PATNA): बिहार में फिर से नीतिशे कुमार हैं लेकिन इस बार बहुत ज्यादा और सचमुच बीमार हैं। नीतीश कुमार जितने बीमार है, उतनी ही बीमार पूरी हिंदी पट्टी है। क्या दोनों की बीमारी एक जैसी है, या फिर अलग-अलग है? इन दोनों में ज्यादा बीमार कौन है? ये सवाल गहन विमर्श की मांग करते हैं और इस चर्चा में केवल वही लोग शामिल हो सकते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के न्यूनतम मानदंडों पर खरे उतरते हों।
पहले बात नीतीश कुमार की बीमारी की। बिहार में आयुष डॉक्टरों का नियुक्ति पत्र बांटा जा रहा था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों के साथ नये डॉक्टरों को आशीर्वाद देने के लिए उपस्थित थे। नियुक्ति पत्र हासिल करने वालों में एक नौजवान मुस्लिम डॉक्टर भी थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेहद आपत्तिजनक ढंग से उसका नकाब खींच दिया। यह घटना 25 साल पहले हुई होती तो शायद उतनी बड़ी नहीं मानी जाती।
जेंडर सेंसेटाइजेशन किस चिड़िया का नाम है, यह पुराने समाज को पता नहीं था। बत्तीस दाँतों के बीच जीभ की तरह किसी तरह खुद को बचाती लड़कियां, औरतें घर से निकलती थीं, बस, ट्रेन से लेकर अपने कार्यस्थल डरी-सहमी रहती थीं। अनगिनत
फब्तियां, बदत्तमीजियां और अक्सर छोटी-मोटे शारीरिक अतिक्रमण को भी नज़रअंदाज़ कर दिया करती थीं। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। कानून बन चुके हैं। खुलकर शिकायतें आ रही हैं। हर दफ्तर में कमेटी है। लोग दंडित किये जा रहे हैं और कुछ मामलों में जेल तक जा रहे हैं।
जिसे भी सेक्सुअल हरासमेंट की कानूनी परिभाषा पता है, वो समझ सकता है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने जो किया है, वह पूरी तरह हरासमेंट और यौन अतिक्रमण के दायरे में आता है। इस केस में लड़की के पास शिकायत करने का नैतिक और कानूनी अधिकार दोनों हैं। लेकिन अब आता है, दूसरा सवाल। क्या नीतीश कुमार ने ऐसी हरकत कोई पहली बार की है? उत्तर है नहीं और यहीं से उनकी सेहत से जुड़े सवाल सिर उठाते हैं।
पिछले डेढ़-दो साल से बहुत से मौकों पर आसपास खड़ी किसी औरत के साथ नीतीश कुमार अजीब तरह की आक्रमक और लगभग हमलावर मुद्रा में नज़र आये हैं। यू ट्यूब पर सर्च कीजिये आपको बहुत सारे ऐसे फुटेज मिल जाएंगे, जब किसी महिला उम्मीदवार ने नीतीश कुमार के गले में बड़ी शालीनता से फूलों की माला डाली और बदले में नीतीश हमलावर तरीके से आगे बढ़ते हुए उसे तीन-चार हार एक साथ पहना दिये, जैसे राक्षस विवाह की तरह स्वयंवर लूट रहे हों।
बिहार विधानसभा में परिवार नियोजन के नाम पर दिया गया नीतीश कुमार का वक्तव्य उनकी मानसिक स्थिति को दर्शाता है। परिवार नियोजन की बात करते-करते नीतीश कुमार ने स्त्री-पुरुष के अंतरंग संबंधों को खाका खींचना शुरू किया। सदन में मौजूद लोगों के मना करने तक पर नहीं रुके। आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ होगा जब किसी राज्य का मुख्यमंत्री विधानसभा में पोर्नोग्राफिक स्टोरी टेलर की भूमिका में दिखा।
सिर्फ ठरकपना या यौन कुंठा कहकर आप नीतीश कुमार के वास्तविक मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित नहीं कर सकते हैं। मैंने जितना पढ़ा है, अल्जाइमर्स और डिमेंशिया के मध्यवर्ती या अंतिम चरण में बहुत से मरीज़ों की स्थिति ऐसी हो जाती है, जब उनका अपनी यौनेच्छा पर नियंत्रण खत्म हो जाता है।
मनोविज्ञान की भाषा आप इसे hyper-sexuality या sexual disinhibition कह सकते हैं। डिमेंशिया जैसी स्थिति या बुढ़ापे में मष्तिष्क के निर्णय लेने और व्यवहार को संचालित करने वाले हिस्से यानी फ्रंटल लोब के क्षतिग्रस्त होने से भी व्यवहार और भाव-भंगिमाएं अनियंत्रित हो सकती हैं।

नीतीश कुमार अपने जीवन के सक्रिय दिनों में मानसिक रूप से काफी चुस्त रहे हैं। उनका पहले का कोई ऐसा ट्रैक रिकॉर्ड भी नहीं है, जिसके आधार पर कई दूसरे राजनेताओं की तरह उन्हें यौन कुंठा से ग्रसित या यौन अपराधी माना जा सके।

राजनीतिक रूप से भले ही मैं नीतीश कुमार को नापसंद करूं लेकिन उनकी वर्तमान मानसिक स्थिति मेरे मन में एक तरह गहरा अफसोस और करूणा का भाव जगाती है। ज़रा सोचकर देखिये पत्नी का निधन बरसों पहले हो चुका है, बेटे के साथ भी ऐसी निकटता नज़र नहीं आती। जीवित रहने की एकमात्र प्रेरणा मुख्यमंत्री की कुर्सी है। अपनी मानसिक स्थिति के साथ यह आदमी कितना अकेला है। उसे मदद और समुचित इलाज की जरूरत है लेकिन मदद करने वाला अपना शायद कोई नहीं।

सार्वजनिक व्यक्तित्व होते हुए भी नीतीश की त्रासदी बहुत हद तक निजी है। लेकिन उनकी हरकतों के बाद आई प्रतिक्रियाएं बता रही हैं कि हिंदी पट्टी या हिंदू पट्टी को एक ऐसी सड़ांध भरी बीमारी ने जकड़ लिया जिसका इलाज बहुत कठिन है।
नीतीश ने विधानसभा में परिवार नियोजन पर जब अपना ऐतिहासिक वकतव्य दिया था, तब उनकी सरकार में आरजेडी और कांग्रेस भी शामिल थे। ज़ाहिर है, बीजेपी की तरफ से इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया आई। बीजेपी की बहुत सी नेत्रियां नीतीश पर हमलावर हो गईं और उनसे इस्तीफा तक मांगा जाने लगा।

नीतीश जब पाला बदकर एनडीए में आ गये तो वो फिर से स्त्री उद्धारक बन गये। बीजेपी इस छवि से खुश हैं और बिहार की महिला वोटरों ने एक स्वर में बता दिया कि उन्हें नीतीश के किसी व्यवहार से कोई शिकायत नहीं। महिला उम्मीदवरों के गले में माला डालने से लेकर उनकी हर आपत्तिजनक शारीरिक भंगिमा को बीजेपी और समाज के एक बड़े हिस्से ने नज़रअंदाज किया।

लेकिन एक मुसलमान औरत नकाब पलटते ही समाज के एक बड़े हिस्से में हर्षोल्लास की लहर दौड़ पड़ी। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री का इंटरव्यू वायरल हो रहा है। सवाल पूछने वाले पत्रकार और जवाब देने वाले मंत्री की देह-भाषा और शब्दों के चयन पर गौर कीजिये। कितनी गंदगी, कितनी लंपटता और नीचता टपक रही है।

सोशल मीडिया पर ऐसे बूढ़े भी लंगोट कसकर मैदान में उतर चुके हैं, जिन्हें नकाब उलट देने की नीतीश कुमार की हरकत क्रांतिकारी लग रही है, जिससे पर्दा प्रथा खत्म हो जाएगी। यह तर्क उतना ही बेहूदा है, जितना सड़क पर किसी की हत्या हो जाने के बाद यह दलील देना कि देश की आबादी बेलगाम तरीके से बढ़ रही है और जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है।

अगर जबरन किसी का नकाब पलटना क्रांतिकारी है तो फिर विधासनभा में परिवार नियोजन के तरीकों पर प्रकाश डालना प्रगतिशील क्यों नहीं है? नीतीश की हरकत के समर्थक बूढ़ों को उनसे वक्त लेकर मिलना चाहिए और माँग करनी चाहिए कि वो उनके नव-विवाहित बेटी दामाद या बेटा-बहू के लिए ऐसी कोई कार्यशाला और आयोजित करें और परिवार नियोजन का महत्व बतायें।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान की एक दिल-दहलाने वाली तस्वीर आपने देखी होगी। एक अधेड़ यहूदी औरत भाग रही है, उसके कपड़े फटे हुए हैं और नस्ली श्रेष्ठता के मारे कुछ किशोर शिकारी कुत्तों की तरह उसका पीछा कर रहे हैं। भारतीय समाज भी उसी रास्ते पर है। क्योंकि पीड़ित एक मुसलमान है, इसलिए समाज के एक हिस्से में सेलिब्रेशन का भाव है। सोशल मीडिया पर बहुत सारी औरतें तक वो भाषा बोलती दिखाई दे रही हैं, जो एक बलात्कारी मर्द की भाषा होती है।

नीतीश कुमार बीमार है लेकिन उनकी बीमारी स्वैच्छिक नहीं है। वह शारीरिक ज्यादा और मनोवैज्ञानिक कम है। समाज गहरी मनोवैज्ञानिक बीमारी का शिकार है और उसने अपनी बीमारी खुद चुनी है। यह उसी तरह का मास हीस्टीरिया है, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में नज़र आया था। सड़ांध भरी दलदल बहुत गहरी है और गोबर पट्टी को इसमें अभी और डूबना है।
NEWS ANP के लिए ब्यूरो रिपोर्ट पटना

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *